बिहार की राजधानी पटना के पास बहने वाली पुनपुन नदी, जो लाखों लोगों के लिए धार्मिक और कृषि का आधार है, इन दिनों एक अजीब और डरावनी वजह से चर्चा में है। नदी की सतह पर तैरता हुआ ‘गुलाबी जहरीला झाग’ (Pink Toxic Foam) न केवल आँखों को चुभ रहा है, बल्कि यह इस पवित्र जलधारा के खत्म होने का संकेत भी दे रहा है।

यह गुलाबी झाग आखिर है क्या?
नदी में झाग का बनना पानी में ‘सर्फेक्टेंट्स’ (Surfactants) और ‘फॉस्फेट’ (Phosphates) की अधिकता को दर्शाता है। ये रसायन मुख्य रूप से घरों से निकलने वाले डिटर्जेंट और साबुनों से आते हैं। जब ये रसायन नदी के बहाव या किसी झरने से टकराते हैं, तो सफेद झाग पैदा करते हैं। लेकिन पुनपुन नदी में इस झाग का रंग ‘गुलाबी’ होना एक गंभीर औद्योगिक प्रदूषण की ओर इशारा करता है।
वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, यह गुलाबी रंग टेक्सटाइल डाई (जैसे रोडामाइन बी – Rhodamine B) या पेपर मिलों से निकलने वाले लिग्निन (Lignin) कचरे के कारण हो सकता है। जब उद्योगों का रंगीन केमिकल युक्त पानी बिना ट्रीटमेंट के नदी में मिलता है, तो वह सफेद झाग के साथ मिलकर उसे गुलाबी बना देता है।
प्रदूषण के मुख्य स्रोत: पेपर मिल और गंदे नाले
पटना और फतुहा के बीच स्थित कई औद्योगिक इकाइयाँ इस प्रदूषण का बड़ा कारण मानी जा रही हैं। बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (BSPCB) ने पुनपुन बेसिन में कई ‘अत्यधिक प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों’ (Grossly Polluting Industries – GPIs) की पहचान की है:
- स्मृति पेपर मिल्स (Smirity Paper Mills): महुली रोड स्थित यह मिल भारी मात्रा में पानी का उपयोग करती है और इसका कचरा नदी के पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित करता है।
- इंदिरा और पटना पेपर मिल्स: इन इकाइयों से निकलने वाला काला-भूरा पानी और रासायनिक अवशेष अक्सर नदी में छोड़े जाते हैं।
- बादशाही नाला: पटना शहर का अनुपचारित सीवेज (Sewage) बादशाही नाले के जरिए सीधे पुनपुन में गिरता है, जो नदी में बैक्टीरिया (Faecal Coliform) के स्तर को खतरनाक हद तक बढ़ा देता है।
सेहत और पर्यावरण पर इसके खतरनाक असर
यह झाग सिर्फ बदसूरत नहीं, बल्कि जानलेवा भी है:
- कैंसर का खतरा: झाग में मौजूद सिंथेटिक डाई जैसे रोडामाइन बी को ‘कार्सिनोजेनिक’ (कैंसर पैदा करने वाला) माना जाता है। यह त्वचा में जलन, आँखों में खुजली और सांस की बीमारियों का कारण बनता है।
- जलीय जीवों की मौत: नदी के ऊपर झाग की मोटी परत ऑक्सीजन को पानी के अंदर जाने से रोक देती है (Hypoxia), जिससे मछलियां और अन्य जीव दम घुटने से मर जाते हैं।
- खेती और पशुओं पर प्रभाव: पुनपुन का पानी सिंचाई के लिए इस्तेमाल होता है। जहरीले रसायनों वाला यह पानी फसलों के जरिए हमारी फूड चेन में पहुँच रहा है। पशुओं के लिए भी यह पानी घातक साबित हो रहा है।
2026 में क्या है वर्तमान स्थिति?
मार्च 2026 की ताजा रिपोर्टों के अनुसार, बिहार सरकार ने ‘नमामि गंगे’ और अन्य योजनाओं के तहत 18 नए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) चालू किए हैं, जिससे गंगा की सेहत में सुधार हुआ है। हालांकि, पुनपुन नदी अभी भी ‘Priority-V’ श्रेणी में है, जिसका मतलब है कि यहाँ प्रदूषण का स्तर अभी भी चिंताजनक है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने हाल ही में (OA 127/2025) उद्योगों को निर्देश दिया है कि वे ‘ऑनलाइन कंटीन्यूअस एफ्लुएंट मॉनिटरिंग सिस्टम’ (OCEMS) लगाएं ताकि प्रदूषण पर 24 घंटे नजर रखी जा सके।














