बिहार के माता-पिता के लिए एक बहुत बड़ी खुशखबरी है। राज्य सरकार ने बच्चों के बेहतर भविष्य और उनकी सेहत को ध्यान में रखते हुए एक बड़ा फैसला लिया है। अब बिहार के सभी 38 जिलों में ‘होम-बेस्ड केयर फॉर यंग चाइल्ड’ (HBYC) यानी छोटे बच्चों की गृह-आधारित देखभाल योजना को पूरी तरह लागू कर दिया गया है। पहले यह सुविधा केवल 23 जिलों (13 आकांक्षी और 10 अन्य) में चल रही थी, लेकिन अब इसे पूरे प्रदेश में विस्तार दे दिया गया है।
यह कदम मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के ‘सात निश्चय-3’ (2025-2030) रोडमैप का एक अहम हिस्सा है, जिसका लक्ष्य “सुलभ स्वास्थ्य और सुरक्षित जीवन” सुनिश्चित करना है।

क्या है HBYC योजना और यह क्यों जरूरी है?
आमतौर पर जन्म के बाद शुरुआती 42 दिनों तक ‘होम-बेस्ड न्यूबॉर्न केयर’ (HBNC) के तहत आशा कार्यकर्ता घर आती हैं। लेकिन 42 दिनों के बाद और 15 महीने की उम्र तक बच्चों की देखभाल में एक बड़ा गैप आ जाता था। इसी कमी को दूर करने के लिए HBYC योजना लाई गई है।
बिहार में कुपोषण और स्टंटिंग (उम्र के हिसाब से कद कम होना) की समस्या काफी अधिक रही है। आंकड़ों के मुताबिक, बिहार में करीब 43% से 48% बच्चे स्टंटिंग का शिकार हैं। निमोनिया, डायरिया और पोषण की कमी बच्चों की मृत्यु दर के मुख्य कारण रहे हैं। HBYC के माध्यम से सरकार इन समस्याओं को जड़ से खत्म करना चाहती है।
आशा कार्यकर्ताओं का शेड्यूल: 15 महीने तक 5 अतिरिक्त विजिट
इस योजना के तहत प्रशिक्षित आशा कार्यकर्ता आपके घर आकर बच्चे की सेहत की जांच करेंगी। HBNC की शुरुआती मुलाकातों के बाद, अब आशा कार्यकर्ता बच्चे के:
- तीसरे महीने
- छठे महीने
- नौवें महीने
- बारहवें महीने
- पंद्रहवें महीने पर विशेष गृह भ्रमण (Home Visit) करेंगी।
इन मुलाकातों के दौरान आशा कार्यकर्ता न केवल बच्चे का वजन और लंबाई मापेंगी, बल्कि माँ को उचित स्तनपान, पूरक आहार (Complementary Feeding) और टीकाकरण के बारे में भी समझाएंगी।
‘नवचेतना’ और ‘ECD किट’: खेल-खेल में विकास की परख
बिहार सरकार ने इस योजना को और प्रभावी बनाने के लिए ‘नवचेतना’ (Navchetna) गाइडलाइंस और ‘अर्ली चाइल्डहुड डेवलपमेंट’ (ECD) किट का इस्तेमाल शुरू किया है।
आशा कार्यकर्ताओं को एक विशेष किट दी जाती है जिसमें लाल रंग की रिंग, छोटी घंटी, आईना, रंगीन क्यूब्स और क्रैयॉन जैसी चीजें होती हैं। इन खिलौनों के माध्यम से यह देखा जाता है कि बच्चा सही समय पर प्रतिक्रिया दे रहा है या नहीं। जैसे:
- क्या 2-4 महीने का बच्चा लाल रिंग को देखकर अपनी आंखें घुमाता है?
- क्या 6 महीने का बच्चा आईने में अपना अक्स देखकर खुश होता है?
- क्या 9-12 महीने का बच्चा अंगूठे और उंगली से दाना उठा पाता है?
अगर विकास में कोई कमी दिखती है, तो बच्चे को तुरंत जिला प्रारंभिक हस्तक्षेप केंद्र (DEIC) रेफर किया जाता है।
आशा कार्यकर्ताओं के लिए खुशखबरी: बढ़ा प्रोत्साहन भत्ता
सरकार ने इस जमीनी काम को करने वाली हमारी आशा बहनों का भी ख्याल रखा है। जुलाई 2025 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने घोषणा की थी कि आशा कार्यकर्ताओं का मासिक प्रोत्साहन भत्ता 1,000 रुपये से बढ़ाकर 3,000 रुपये कर दिया गया है। इसके अलावा, HBYC के तहत होने वाली 5 विजिट्स के लिए भी उन्हें अलग से प्रोत्साहन राशि दी जाती है।
डिजिटल बिहार: ANMOL और U-WIN ऐप का जादू
अब सारा डेटा कागजों के बजाय डिजिटल तरीके से फीड किया जा रहा है। ANMOL ऐप के जरिए एएनएम (ANM) माता और शिशु के स्वास्थ्य का रियल-टाइम रिकॉर्ड रखती हैं। वहीं, टीकाकरण के लिए ‘U-WIN’ पोर्टल का उपयोग किया जा रहा है, जिससे एक भी बच्चा वैक्सीन से न छूटे।
सात निश्चय-3: विकसित बिहार की ओर बढ़ते कदम
16 दिसंबर 2025 को बिहार कैबिनेट ने ‘सात निश्चय-3’ को मंजूरी दी। इसके तहत अगले पांच सालों में स्वास्थ्य सेवाओं को अत्याधुनिक बनाने का लक्ष्य है। प्रखंड स्तर के स्वास्थ्य केंद्रों को स्पेशलिटी अस्पतालों और जिला अस्पतालों को सुपर-स्पेशलिटी अस्पतालों में बदला जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों की कमी को पूरा करने के लिए सरकार ने विशेष प्रोत्साहन और नए मेडिकल कॉलेजों (जैसे सीवान, वैशाली, भोजपुर) की शुरुआत की है।
बिहार HBYC योजना 38 जिले
बिहार के सभी 38 जिलों में HBYC योजना का पहुंचना स्वास्थ्य क्रांति की ओर एक बड़ा कदम है। यह योजना न केवल बच्चों की जान बचाएगी, बल्कि उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत भी बनाएगी। अभिभावकों से अपील है कि जब भी आशा कार्यकर्ता आपके घर आएं, उनके साथ पूरा सहयोग करें और अपने बच्चे के उज्ज्वल भविष्य के लिए उनके सुझावों को जरूर अपनाएं।
















