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दिवाली का यूनेस्को सम्मान और वैश्विक पहचान​

बस हाल ही में कुछ दिन पहले एक ऐसी खुशखबरी आई जो हर भारतीय के दिल को गदगद कर गई। दिवाली, हमारी रोशनी का त्योहार, अब यूनेस्को की इनटैंजिबल कल्चरल हेरिटेज लिस्ट पर दर्ज हो गई है। यह सिर्फ एक फॉर्मलिटी नहीं है – यह हमारी संस्कृति को विश्व मंच पर सबसे बड़ी मान्यता देना है। और जहां तक दिवाली की वैश्विक लोकप्रियता की बात है, तो यह फैसला आने वाले दिनों में इसे एक और मजबूत पंख देने वाला है।

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पहली बात यह है कि यूनेस्को की मान्यता का मतलब दुनियाभर में एक आधिकारिक स्वीकृति है। जब किसी चीज़ को यूनेस्को का ठप्पा मिल जाता है, तो उसकी विश्वसनीयता बढ़ जाती है। दिवाली को अब सिर्फ भारतीयों का त्योहार नहीं माना जाएगा – यह मानवता की साझा सांस्कृतिक संपत्ति बन गई है। इसका मतलब है कि दुनिया के किसी भी कोने में रहने वाले लोग इसे सम्मान की दृष्टि से देखेंगे। यह दिवाली की छवि को राजनीतिक या धार्मिक सीमाओं से बाहर ले जाता है और इसे एक सार्वभौमिक मानवीय परंपरा बना देता है।

दूसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात – वैश्विक पर्यटन में एक जबरदस्त वृद्धि आने वाली है। जब यूनेस्को किसी चीज़ को मान्यता देता है, तो दुनियाभर के शहर, संग्रहालय और सांस्कृतिक संस्थान उसकी ओर ध्यान देने लगते हैं। विदेश से आने वाले सैलानी अब भारत में दिवाली देखने के लिए विशेष यात्राएं योजना बनाएंगे। होटल, रेस्तरां, और स्थानीय व्यापार को नया बूम मिलेगा। लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि भारत के कारीगर, दिये बनाने वाले, और पारंपरिक कलाकार इससे सीधा फायदा उठाएंगे। उनके कौशल को अब विश्व मंच पर स्वीकृति मिलेगी।

भारतीय डायास्पोरा को भी इससे एक नई शक्ति मिलेगी। दुनियाभर में लंदन, न्यूयॉर्क, सिंगापुर, और जोहान्सबर्ग जैसे शहरों में रहने वाले भारतीय समुदाय अपनी दिवाली को अब और गर्व से मना सकते हैं। यूनेस्को की मान्यता उन्हें यह बताने का वैध माध्यम देती है कि उनकी परंपरा केवल एक धार्मिक त्योहार नहीं है, बल्कि मानवता की विरासत है। इससे अंतर-सांस्कृतिक संवाद बेहतर होगा। अन्य समुदाय के लोग भी दिवाली को समझना चाहेंगे और इसमें भाग लेना चाहेंगे।

यह निर्णय भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक जीत भी है। यह सिर्फ दिवाली के बारे में नहीं है – यह भारत की सांस्कृतिक शक्ति और विश्व नेतृत्व को दिखाता है। भारत ने पहली बार यूनेस्को की इस बैठक को होस्ट किया है, और दिल्ली की लाल किले में यह सेशन हुआ है। इससे यह स्पष्ट संदेश जाता है कि भारत न केवल अपनी परंपरा को जानता है, बल्कि उसे विश्व के साथ साझा करने में भी सक्षम है।

तकनीकी रूप से क्या होगा? यूनेस्को की इस मान्यता के बाद, दिवाली को संरक्षण के लिए विशेष कार्यक्रम मिलेंगे। पारंपरिक कौशल को सिखाने के लिए धन मिलेगा। युवाओं को रंगोली, दिये बनाने, और पारंपरिक मिठाई बनाने के कला को सीखने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। यह भारत की 16वीं सांस्कृतिक विरासत है जो यूनेस्को में दर्ज हुई है – कुंभ मेला, दुर्गा पूजा, गरबा जैसे अन्य परंपराओं के साथ।

आखिरकार, दिवाली का यूनेस्को में होना मतलब है – रोशनी की जीत को विश्व ने स्वीकार कर लिया। यह त्योहार अब सिर्फ भारत का नहीं रहा, यह मानवता का हो गया। आने वाले सालों में दिवाली को मनाने वाले लोगों की संख्या बढ़ेगी, और यह परंपरा नई पीढ़ियों तक पहुंचेगी – भारत में भी, और दुनिया भर में भी। यह सिर्फ एक स्वीकृति नहीं है, यह हमारी संस्कृति का एक नया अध्याय है।

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