हिंदू पंचांग के अनुसार, 2026 में वरूथिनी एकादशी सोमवार, 13 अप्रैल को मनाई जाएगी ।
| विशेष विवरण | समय और तिथि |
| एकादशी तिथि प्रारंभ | 13 अप्रैल, 2026 को रात 01:16 AM बजे |
| एकादशी तिथि समाप्त | 14 अप्रैल, 2026 को रात 01:08 AM बजे |
| व्रत का दिन | 13 अप्रैल, 2026 (सोमवार) |
| पारण (व्रत खोलने का समय) | 14 अप्रैल, 2026 को 06:54 AM से 08:31 AM तक |
| हरि वासर समाप्ति क्षण | 14 अप्रैल, 2026 को सुबह 06:54 AM बजे |
ध्यान दें: एकादशी व्रत का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए पारण शुभ मुहूर्त के भीतर करना अनिवार्य है ।

वरूथिनी एकादशी का महत्व और लाभ
भगवान कृष्ण ने स्वयं राजा युधिष्ठिर को इस एकादशी की महिमा बताते हुए कहा था कि इसका फल दस हजार वर्षों की तपस्या के बराबर है ।
- पापों का नाश: यह व्रत जाने-अनजाने में हुए भीषण पापों को नष्ट कर देता है ।
- सौभाग्य की प्राप्ति: मान्यता है कि यदि कोई दुखी महिला इस व्रत को रखती है, तो उसका सौभाग्य जागृत होता है ।
- दान का फल: इस एकादशी का फल स्वर्ण दान और कन्यादान से भी अधिक माना गया है । शास्त्रों के अनुसार, हाथी के दान से श्रेष्ठ भूमि दान है, भूमि दान से श्रेष्ठ तिल दान, तिल दान से श्रेष्ठ स्वर्ण दान और इन सबसे श्रेष्ठ अन्न दान है । लेकिन विद्या दान को सबसे सर्वोच्च माना गया है और वरूथिनी एकादशी का व्रत रखने से इन सभी दानों के समान पुण्य मिलता है।
व्रत कथा: राजा मान्धाता की कहानी
प्राचीन काल में नर्मदा नदी के तट पर राजा मान्धाता नाम के एक धर्मात्मा राजा राज्य करते थे । एक बार जब वे जंगल में तपस्या कर रहे थे, तब एक जंगली भालू ने उन पर हमला कर दिया और उनके पैर को चबाने लगा । राजा अत्यंत पीड़ा में थे, लेकिन उन्होंने क्रोध नहीं किया और धैर्य के साथ भगवान विष्णु को पुकारा ।
भगवान विष्णु तुरंत प्रकट हुए और सुदर्शन चक्र से भालू का अंत किया । भालू द्वारा पैर खा लिए जाने के कारण राजा दुखी थे, तब भगवान ने उन्हें मथुरा जाकर वरूथिनी एकादशी का व्रत करने और उनके वामन अवतार की पूजा करने को कहा । राजा ने पूर्ण श्रद्धा से व्रत किया और इसके प्रभाव से उनका पैर पहले जैसा सुंदर और स्वस्थ हो गया । इसके अतिरिक्त, राजा धुंधुमार को शिव जी के श्राप से हुई कोढ़ की बीमारी भी इसी व्रत के प्रभाव से ठीक हुई थी ।
पूजा विधि और नियम (Vrat Vidhi)
वरूथिनी एकादशी पर भगवान विष्णु के वामन रूप की पूजा की जाती है ।
- दशमी के नियम: व्रत की तैयारी एक दिन पहले (दशमी तिथि) से शुरू हो जाती है। दशमी के दिन मसूर की दाल, चना, कोदो अनाज, शाक, शहद और कांसे के बर्तन में भोजन नहीं करना चाहिए ।
- पूजा प्रक्रिया: एकादशी की सुबह जल्दी स्नान कर पीले वस्त्र पहनें और भगवान विष्णु/वामन देव के समक्ष व्रत का संकल्प लें । भगवान को पीले फूल, तुलसी दल, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें ।
- मंत्र जप: “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का निरंतर जप करें । विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना भी अत्यंत शुभ होता है ।
- जागरण: एकादशी की रात को सोना नहीं चाहिए। रात भर भजन-कीर्तन करते हुए जागरण करने से अनंत पुण्य की प्राप्ति होती है ।
फलाहार के नियम
एकादशी पर अन्न (चावल, गेहूं, दालें) पूरी तरह वर्जित है ।
- क्या खाएं: आलू, साबूदाना, कट्टू का आटा, राजगिरी का आटा, फल, दूध और दही का सेवन किया जा सकता है । भोजन में केवल सेंधा नमक का ही प्रयोग करें ।
- क्या न करें: शरीर या भोजन में तेल का प्रयोग न करें । शहद और पराए घर का भोजन न करें । गुटखा, सुपारी और पान का सेवन भी निषेध है ।

















