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डिजिटल लेबर चौक

बिहार के लाल ने बनाया मजदूरों के लिए ‘LinkedIn’: डिजिटल लेबर चौक की पूरी कहानी

भारत में अक्सर हम ‘LinkedIn‘ या ‘Naukri.com‘ जैसे प्लेटफॉर्म्स की बात करते हैं, लेकिन ये सभी सफेदपोश (White-collar) नौकरियों के लिए हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि एक राजमिस्त्री, पेंटर या बढ़ई अपना काम कैसे ढूंढता है? बिहार के एक युवा चंद्रशेखर मंडल ने इसी सवाल का जवाब ‘डिजिटल लेबर चौक’ के रूप में दिया है।

डिजिटल लेबर चौक

एक बारिश वाली दोपहर और एक बड़ा विचार

दरभंगा (बिहार) के छोटे से गाँव ‘अमी’ से ताल्लुक रखने वाले चंद्रशेखर मंडल खुद एक साधारण परिवार से आते हैं। साल 2020 में, नोएडा में एक बैंक में नौकरी करते समय उन्होंने अपने ऑफिस की बालकनी से देखा कि भारी बारिश में सैकड़ों मजदूर शेड के लिए इधर-उधर भाग रहे थे। उन्हें अपने बचपन की याद आई जब उनके रिश्तेदार भी इसी तरह तपती धूप और बारिश में काम की तलाश में चौराहों पर खड़े रहते थे।

तभी उनके मन में विचार आया—”अगर पढ़े-लिखे लोगों के लिए ऑनलाइन प्लेटफॉर्म हो सकते हैं, तो इन मजदूरों के लिए क्यों नहीं?” इसी विचार ने ‘गौद्रिका डिजिटल लेबर चौक प्राइवेट लिमिटेड’ को जन्म दिया।

डिजिटल लेबर चौक क्या है?

यह भारत का पहला ऐसा ऑनलाइन पोर्टल है जो दिहाड़ी मजदूरों को सीधे ठेकेदारों और कंपनियों से जोड़ता है। इसका मुख्य उद्देश्य शारीरिक लेबर चौक की समस्याओं जैसे—काम न मिलना, खराब मौसम की मार और बिचौलियों (Middlemen) द्वारा कमीशन खाना—को खत्म करना है।

यह कैसे काम करता है?

यह स्टार्टअप दो अलग-अलग ऐप्स के माध्यम से काम करता है:

  1. मजदूरों के लिए (Worker App): यह ऐप 15 क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध है। मजदूर अपनी स्किल (जैसे- प्लंबर, बिजली मिस्त्री, राजमिस्त्री) और अपना पसंदीदा वेतन दर्ज कर रजिस्ट्रेशन करते हैं।
  2. ठेकेदारों/कंपनियों के लिए (Business App): यहाँ ठेकेदार अपनी जरूरत (मजदूरों की संख्या, स्थान, मजदूरी) पोस्ट करते हैं। वे मजदूरों की रेटिंग और पिछला काम देखकर उन्हें चुन सकते हैं।

खास बात यह है कि जिनके पास स्मार्टफोन नहीं है, उनके लिए चंद्रशेखर ने स्थानीय मोबाइल दुकानों को ‘बिजनेस एसोसिएट’ बनाया है, जो मजदूरों का रजिस्ट्रेशन करने में मदद करते हैं।

सफलता के आंकड़े और प्रभाव

मार्च 2023 में बाजार में उतरने के बाद से इस स्टार्टअप ने बड़ी उपलब्धियां हासिल की हैं:

  • पंजीकृत मजदूर: 1.6 लाख से ज्यादा।
  • पंजीकृत ठेकेदार: 12,000 से अधिक।
  • कंपनियाँ: 850 से ज्यादा कॉर्पोरेट क्लाइंट्स।
  • पहुँच: बिहार, यूपी, दिल्ली-NCR और झारखंड सहित 27 राज्यों में सक्रिय।

प्रभाव की कहानी: गोपालगंज के सुमित कुमार जैसे मजदूर, जो लॉकडाउन में पैदल घर लौटे थे, अब इस ऐप की मदद से अपने घर के पास ही काम ढूंढ पा रहे हैं। वहीं, दरभंगा के श्रवण कुमार बताते हैं कि अब वे एक साल में उतना कमा लेते हैं जितना पहले तीन साल में कमाते थे।

कमाई का जरिया

  • मजदूरों के लिए: यह पूरी तरह मुफ्त है।
  • ठेकेदारों के लिए: पहले 10 मजदूरों से जुड़ना मुफ्त है, उसके बाद ₹499 से ₹1999 तक के सब्सक्रिप्शन प्लान लेने होते हैं।

डिजिटल लेबर चौक : सरकार का साथ और निवेश

चंद्रशेखर ने अपनी जमापूंजी (मात्र ₹20,000-40,000) से शुरुआत की थी। बाद में उन्हें कई सरकारी योजनाओं का लाभ मिला:

  • Startup Bihar: ₹10 लाख का ब्याज मुक्त ऋण।
  • CM Udyami Yojana: ₹10 लाख की सहायता (50% अनुदान + 50% ऋण)।
  • Startup India Seed Fund: ₹15 लाख का लोन।

इसके अलावा, सोशल अल्फा (Social Alpha) और कैंपस फंड (Campus Fund) जैसे संस्थानों ने भी इसमें निवेश किया है।

डिजिटल लेबर चौक : पुरस्कार और सम्मान

डिजिटल लेबर चौक को अपनी नवीन सोच के लिए कई राष्ट्रीय पुरस्कार मिले हैं:

  • IGNOU द्वारा ‘बेस्ट स्टार्टअप अवार्ड 2023’।
  • Hitachi India के नेशनल इनोवेशन चैलेंज में ₹30 लाख का इनाम।
  • Citi Bank & IIT-K द्वारा सोशल इनोवेशन लैब चैलेंज के विजेता।

भारत सरकार की मान्यता (2025 का बड़ा अपडेट)

इस मॉडल की सफलता को देखते हुए, नवंबर 2025 में केंद्रीय श्रम और रोजगार मंत्रालय ने भी अपना ‘डिजिटल लेबर चौक’ मोबाइल ऐप लॉन्च किया है। सरकार अब शारीरिक लेबर चौकों को ‘लेबर चौक सुविधा केंद्रों’ (LCFCs) में बदलने की योजना बना रही है, जहाँ मजदूरों को पीने का पानी, शौचालय और स्वास्थ्य कैंप जैसी सुविधाएं मिलेंगी।

भविष्य की योजना

चंद्रशेखर अब मजदूरों के लिए ‘डिजिटल लेबर कार्ड’ बनाने पर काम कर रहे हैं, जो उनकी एक आधिकारिक पहचान बनेगा। साथ ही, वे मजदूरों के कौशल विकास (Upskilling) और सूक्ष्म-बीमा (Micro-insurance) जैसी सुविधाएं भी प्लेटफॉर्म पर जोड़ने जा रहे हैं।

डिजिटल लेबर चौक सिर्फ एक स्टार्टअप नहीं, बल्कि एक सामाजिक क्रांति है। इसने यह साबित कर दिया है कि टेक्नोलॉजी केवल सूट-बूट वालों के लिए नहीं, बल्कि देश का निर्माण करने वाले पसीने से तर-बतर मजदूरों के लिए भी उतनी ही जरूरी है।

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