एक समय था जब बिहार में कैंसर का नाम सुनते ही मरीज और उनके परिवार के पसीने छूट जाते थे। बीमारी का डर तो था ही, साथ ही दिल्ली के एम्स या मुंबई के टाटा मेमोरियल अस्पताल जाने की मजबूरी और वहां के भारी खर्च का बोझ उन्हें तोड़ देता था। लेकिन आज तस्वीर बदल रही है। ‘आत्मनिर्भर बिहार’ के विजन के साथ राज्य में कैंसर देखभाल का एक ऐसा मजबूत ढांचा तैयार हो रहा है, जिससे मरीजों का दूसरे राज्यों की ओर पलायन कम हुआ है।

सरकारी संस्थानों ने बदली सूरत
बिहार में कैंसर उपचार की आत्मनिर्भरता में पटना के इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (IGIMS) और AIIMS पटना की भूमिका सबसे बड़ी है। IGIMS को अब ‘राज्य कैंसर संस्थान’ (SCI) के रूप में विकसित किया गया है, जहाँ रेडिएशन से लेकर जटिल सर्जरी तक की सुविधा एक ही छत के नीचे है । यहाँ आधुनिक लीनियर एक्सेलेरेटर (LINAC) और PET-CT जैसी मशीनें उपलब्ध हैं, जो कैंसर की सटीक पहचान और इलाज करती हैं । वहीं AIIMS पटना अपनी अत्याधुनिक तकनीकों और विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम के साथ राज्य को नई ऊंचाइयों पर ले जा रहा है ।
मुजफ्फरपुर: उत्तर बिहार का नया उम्मीद केंद्र
मुजफ्फरपुर में होमी भाभा कैंसर अस्पताल एवं अनुसंधान केंद्र (HBCH&RC) की स्थापना बिहार के लिए वरदान साबित हुई है। टाटा मेमोरियल सेंटर (TMC) के सहयोग से बना यह अस्पताल न केवल बिहार बल्कि नेपाल और पड़ोसी राज्यों के मरीजों को भी सेवा दे रहा है । अल्केम फाउंडेशन के सहयोग से यहाँ ‘संप्रदा सिंह मेमोरियल रेडियोथेरेपी सेंटर’ शुरू किया गया है, जहाँ प्रतिदिन 150 से अधिक मरीजों का इलाज हो रहा है । यहाँ ‘हब एंड स्पोक’ मॉडल के तहत बक्सर, जहानाबाद और भागलपुर में मिनी कैंसर इकाइयाँ भी स्थापित की गई हैं, जो टेलीमेडिसिन के जरिए मुख्य अस्पताल से जुड़ी हैं ।
निजी क्षेत्र और आधुनिक तकनीक
सरकारी प्रयासों के साथ निजी अस्पतालों ने भी बिहार को आत्मनिर्भर बनाने में योगदान दिया है। पटना के पारस हेल्थ ने हाल ही में अपना दूसरा LINAC और उन्नत PET-CT लॉन्च किया है, जिससे यह पूर्वी भारत के उन चुनिंदा केंद्रों में शामिल हो गया है जहाँ डुअल LINAC सिस्टम है । इसके अलावा महावीर कैंसर संस्थान जैसे चैरिटेबल संस्थान दशकों से गरीब मरीजों को रियायती दरों पर इलाज मुहैया करा रहे हैं ।
आर्थिक सुरक्षा: अब पैसा नहीं बनेगा इलाज में बाधा
कैंसर का इलाज महंगा होता है, लेकिन बिहार के मरीजों के लिए अब दो बड़ी ढाल मौजूद हैं:
- आयुष्मान भारत (PM-JAY): इसके तहत पात्र परिवारों को सालाना ₹5 लाख तक का कैशलेस इलाज मिलता है ।
- मुख्यमंत्री चिकित्सा सहायता कोष (CMRF): जो मरीज आयुष्मान भारत के दायरे में नहीं आते, बिहार सरकार उन्हें इस कोष के जरिए आर्थिक मदद देती है ताकि इलाज में देरी न हो । इसके साथ ही प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्रों के माध्यम से कैंसर की दवाएं 80-90% तक कम कीमत पर उपलब्ध कराई जा रही हैं ।
बिहार में कैंसर का इलाज : हर जिले में मेडिकल कॉलेज
मुख्यमंत्री के ‘सात निश्चय’ कार्यक्रम के तहत बिहार सरकार का लक्ष्य राज्य के हर जिले में एक मेडिकल कॉलेज और अस्पताल खोलना है । वर्तमान में 15 सरकारी मेडिकल कॉलेज संचालित हैं और 20 अन्य पर काम चल रहा है । मुजफ्फरपुर के अलावा सिवान, बेगूसराय, बक्सर और मधुबनी जैसे जिलों में भी बुनियादी स्वास्थ्य ढांचे को सुपर-स्पेशियलिटी स्तर तक अपग्रेड किया जा रहा है ।
गांव-गांव तक पहुंचती स्क्रीनिंग मशीनें
कैंसर को हराने का सबसे बड़ा मंत्र है ‘जल्द पहचान’। मुजफ्फरपुर के टाटा मेमोरियल सेंटर द्वारा संचालित मोबाइल कैंसर स्क्रीनिंग वैन गांवों में जाकर स्तन, गर्भाशय और मुख के कैंसर की स्क्रीनिंग कर रही हैं । इससे ग्रामीण महिलाओं को घर के पास ही जांच की सुविधा मिल रही है, जिससे बीमारी को शुरूआती स्टेज में ही पकड़ना आसान हो गया है ।
बिहार में कैंसर का इलाज
कैंसर उपचार में आत्मनिर्भर बिहार का सफर अभी जारी है। हालांकि विशेषज्ञों की कमी और ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं जैसी चुनौतियां आज भी मौजूद हैं, लेकिन जिस तरह से केंद्र और राज्य सरकार मिलकर काम कर रही हैं, वह दिन दूर नहीं जब बिहार पूर्वी भारत का ‘मेडिकल हब’ कहलाएगा। अब मरीजों को इलाज के लिए किसी दूसरे शहर की भीड़भाड़ और अकेलेपन में भटकने की















