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Chhath Puja 2025 : न्यूयॉर्क, लंदन और दुबई में छठ पूजा का बढ़ता जलवा

छठ पूजा अब बिहार की सीमा छोड़कर दुनिया के कोने-कोने में मनाई जाने लगी है। विदेशों में बसे बिहारी लोग अपनी परंपरा को जीवंत रखने के लिए कितनी मेहनत करते हैं—यह कहानी गर्व और आस्था की है।

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विदेशों में छठ: आस्था की सीमा नहीं

दिवाली खत्म होते ही भारत में छठ पूजा का महापर्व शुरू होता है। यह सूर्य देव और छठी मैया को समर्पित चार दिवसीय अनुष्ठान है। लेकिन अब यह पर्व सिर्फ बिहार-यूपी तक सीमित नहीं है। न्यूयॉर्क की बर्फ़ीली सड़कों पर, लंदन के पार्कों में, दुबई के समंदर के किनारे—हर जगह छठ का महापर्व धूमधाम से मनाया जा रहा है।

विदेशों में बसे बिहारी समुदाय ने साबित कर दिया है कि आस्था को कोई सीमा नहीं, कोई बाधा नहीं। वे अपनी माटी से कितना भी दूर क्यों न चले जाएँ, उनकी परंपरा उनके साथ चलती है। यह सिर्फ एक त्यौहार नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़े रहने की जिद है।

लंदन: 20 लाख का चंदा, समुदाय की अदम्य एकता

लंदन के बिहारी समुदाय ने कुछ ऐसा किया जो किसी को भी inspire कर सकता है। उन्होंने मिलकर लगभग £20,000 (करीब 20 लाख रुपये) का भारी-भरकम फंड जमा किया। पर क्यों? ताकि नॉर्थम्प्टनशायर में एक बनावटी तालाब बनाया जा सके, जहाँ 2,000 से अधिक लोग एक साथ अर्घ्य दे सकें।

यह सिर्फ पैसा नहीं था—यह समुदाय की शक्ति थी, एकता थी। हर व्यक्ति ने थोड़ा-थोड़ा देकर अपनी परंपरा को जीवंत रखा। लंदन की ठंड में, विदेशी माहौल में, ये लोग घंटों खड़े रहे, गीत गाए, पूजा की। यह दृश्य किसी को भी रुला देता है।

न्यूयॉर्क और सैन जोस: अमेरिका में माटी की खुशबू

अमेरिका में भी छठ पूजा का जलवा देखने लायक है। न्यूयॉर्क और सैन जोस जैसे शहरों में अब सोप (बाँस के सूप) और पूजा का सारा सामान लोकल दुकानों में मिलने लगा है। यह एक बहुत बड़ी बात है।

सोचिए—अमेरिका में रहने वाले एक भारतीय को छठ की सारी चीजें अपने शहर में ही मिल जाती हैं। यह सिर्फ convenience नहीं है, यह सांस्कृतिक जीत है। इसका मतलब है कि बिहार की संस्कृति अब अमेरिका के किसी छोटे कोने में एक ‘normal’ बात’ बन गई है।

दुबई बीच पर छठ: समंदर किनारे परंपरा

दुबई के ममजार बीच पर 2016 से छठ पूजा का आयोजन हो रहा है। यहाँ हर साल सैकड़ों बिहारी समंदर के किनारे इकट्ठा होते हैं। गर्म बालू, खारा पानी—फिर भी यह भीड़ यहाँ है, क्योंकि पानी तो पानी होता है, चाहे वह गंगा हो या समंदर।

दुबई की चकाचौंध से दूर, बीच पर परिवारों को देखना—बुज़ुर्ग, बच्चे, महिलाएँ—यह दृश्य बताता है कि आस्था कोई luxury नहीं, जरूरत है। हर छठ के दिन, दुबई के उस बीच पर बिहार की खुशबू उड़ने लगती है।

कनाडा की कड़ाके की ठंद में अर्घ्य: dedication की सबसे बड़ी कहानी

अब आइए कनाडा की ओर। यहाँ नवंबर का महीना आते ही कड़ाके की ठंड शुरू हो जाती है। लेकिन इसके बाद भी, कनाडा में बसे बिहारी परिवार पानी में उतरते हैं और अपनी परंपरा निभाते हैं।

-10 डिग्री का तापमान, जमा हुआ पानी, बर्फ़ीली हवा—फिर भी ये लोग अपनी परंपरा नहीं छोड़ते। यह सिर्फ धार्मिकता नहीं है, यह अपनी जड़ों के प्रति commitment है। एक बिहारी का कहना है, “ठंद चाहे जितनी हो, छठ तो छठ है। यही हमारी पहचान है।”

जुगाड़ से तालाब, जुनून से परंपरा: हिम्मत की कहानी

विदेशों में गंगा या कोई बड़ी नदी नहीं मिलती। तो क्या हुआ? बिहारी समुदाय ने खुद ही बनावटी तालाब बना लिए। पार्क में बड़े-बड़े टैंक रखकर, या pool का इस्तेमाल करके, पानी की व्यवस्था की गई। यह ‘जुगाड़’ की भारतीय परंपरा का सबसे शानदार उदाहरण है।

लंदन में सड़कों पर गली-गली में महिलाएँ लोकगीत गाती हुई घूमती हैं। न्यूयॉर्क में कम्युनिटी सेंटर में ठेकुए बनाने की होड़ लगती है। दुबई में समंदर के किनारे परिवार इकट्ठा होते हैं और अर्घ्य देते हैं। यह सब कुछ ‘जुगाड़’ से ही संभव हुआ है।

यह दिखाता है कि अपनी संस्कृति को बचाने के लिए, बिहारी लोग किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं

नई पीढ़ी को माटी से जोड़ना : भविष्य की बुनियाद

विदेशों में पल रहे बिहारी बच्चों के लिए छठ पूजा एक ‘cultural classroom’ बन गई है। जब वे लोकगीत सुनते हैं, तो अपनी भाषा सीखते हैं। जब वे पूजा का अनुष्ठान देखते हैं, तो अपनी परंपरा को समझते हैं। जब वे अपनी माँ को छठ की कथा सुनते हुए देखते हैं, तो बिहार की सुगंध उन्हें याद आती है।

लंदन के एक 7 साल के बिहारी बच्चे को पूछा गया, “तुम्हें छठ पूजा पसंद है?” उसका जवाब था, “मुझे अपनी नानी की बात याद आती है। वह कहती थीं कि छठ में हमारी माटी होती है।” यह भारावेग है, यह जड़ों से जुड़ाव है।

ये बच्चे विदेश में बड़े हो रहे हैं, लेकिन वे अपनी पहचान भूल नहीं रहे। छठ पूजा ही उन्हें बिहारी बनाए रखती है।

ब्रांड्स भी देख रहे हैं: ₹12,000 करोड़ का बाजार

अब यह सिर्फ आस्था की बात नहीं है—यह बड़ा बिज़नेस भी बन गया है। छठ से जुड़ा पूरा व्यापार भारत में लगभग ₹12,000 करोड़ तक पहुँच गया है। इसी वजह से:

  • ITC आशीर्वाद आटा ने छठ के लिए मधुबनी कलाकारों के साथ काम किया।
  • डाबर जैसे बड़े ब्रांड्स भी छठ पर शहद से बने ठेकुए बाँटते हैं।
  • विदेशों में बसे बिहारियों की बढ़ती आर्थिक शक्ति को ब्रांड्स ने पहचान लिया है।

यह साफ़ संदेश है: बिहारी समुदाय अब एक बहुत बड़ा ग्लोबल कस्टमर बेस है, जिसे कोई भी ब्रांड नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता।

UNESCO की मान्यता :  छठ पूजा की दुनियाभर की पहचान

सबसे बड़ी खबर यह है कि भारत सरकार छठ पूजा को यूनेस्को की ‘अमूर्त सांस्कृतिक विरासत’ सूची में शामिल कराने की कोशिश कर रही है। सुप्रीम कोर्ट के एक वकील संदीप कुमार दुबे ने पाँच सालों तक अकेले इस लड़ाई लड़ी है।

अगर यूनेस्को की मान्यता मिलती है, तो:

  • विदेशों में छठ पूजा के आयोजन के लिए सरकारी अनुमति आसान हो जाएगी
  • भारत की सॉफ्ट पावर बढ़ेगी, दुनिया को दिखेगा कि हमारी संस्कृति पर्यावरण, महिला शक्ति और पारिवारिक मूल्यों को कितना महत्व देती है
  • बिहार को दुनिया के सांस्कृतिक नक्शे पर हमेशा के लिए एक जगह मिल जाएगी

बिहार फाउंडेशन की भूमिका: समर्थन और संगठन

यह सब कुछ बिहारी समुदाय की अपनी मेहनत है, लेकिन बिहार फाउंडेशन जैसे संगठन भी इन आयोजनों को प्रोत्साहित करते हैं और विदेशों में बसे बिहारियों को अपनी संस्कृति जीवंत रखने में सहायता करते हैं। यह नेटवर्किंग और संगठन का काम करते हैं, ताकि हर बिहारी अपनी माटी से जुड़ा रहे

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