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महारानी कामसुंदरी देवी

महारानी कामसुंदरी देवी: मिथिला की वो रानी जिन्होंने देश के लिए दान कर दिया था 600 किलो सोना

मिथिला की सांस्कृतिक विरासत और दरभंगा राज के स्वर्णिम इतिहास का एक बड़ा अध्याय 12 जनवरी 2026 को हमेशा के लिए बंद हो गया। दरभंगा राज की अंतिम महारानी कामसुंदरी देवी का 96 वर्ष की आयु में निधन हो गया। वे केवल एक राजघराने की सदस्य नहीं थीं, बल्कि मिथिला की गरिमा और राष्ट्रभक्ति की एक ऐसी मिसाल थीं, जिसकी गूँज इतिहास के पन्नों में हमेशा सुनाई देगी।

महारानी कामसुंदरी देवी

जन्म और प्रारंभिक जीवन: मंगरौनी की बेटी

महारानी कामसुंदरी देवी का जन्म 22 अक्टूबर 1932 को मधुबनी जिले के मंगरौनी गाँव में हुआ था। उनके पिता पंडित हंसमणि झा एक विद्वान परिवार से थे, जिनकी सात पीढ़ियों में कई महान विद्वानों ने जन्म लिया था। मंगरौनी गाँव अपनी बौद्धिक परंपराओं के लिए मशहूर रहा है, और यही संस्कार महारानी के व्यक्तित्व में भी रचे-बसे थे।

उनका विवाह 1940 के दशक में (संभवतः 1943 में) दरभंगा के अंतिम महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह के साथ हुआ था। महाराजा कामेश्वर सिंह की दो पत्नियों, महारानी राजलक्ष्मी और महारानी कामेश्वरी प्रिया के निधन के बाद, कामसुंदरी देवी राजघराने की सबसे वरिष्ठ और सम्मानित सदस्य बनीं।

महारानी कामसुंदरी देवी :1962 का युद्ध और ऐतिहासिक स्वर्ण दान

महारानी कामसुंदरी देवी और दरभंगा राज का नाम भारत के इतिहास में उस समय अमर हो गया, जब 1962 में भारत-चीन युद्ध के दौरान देश संकट में था। तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की अपील पर महाराजा और महारानी ने अपनी तिजोरी देश की सुरक्षा के लिए खोल दी।

इतिहासकारों के अनुसार, दरभंगा के प्रसिद्ध इंद्रभवन मैदान में 15 मन, यानी लगभग 600 किलोग्राम सोना तौलकर भारत सरकार को दान कर दिया गया था । यह उस समय किसी भी व्यक्ति या राजघराने द्वारा दिया गया सबसे बड़ा दान था। इसके अलावा, राज परिवार ने राष्ट्रीय रक्षा के लिए अपने तीन निजी विमान और 90 एकड़ में फैली अपनी निजी हवाई पट्टी (एयरस्ट्रिप) भी सरकार को सौंप दी थी, जहाँ आज दरभंगा एयरपोर्ट स्थित है।

शिक्षा और संस्कृति की संरक्षक

महारानी का मानना था कि ज्ञान ही सबसे बड़ा धन है। उन्होंने अपने पति की स्मृति को जीवित रखने के लिए 16 मार्च 1989 को ‘महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह कल्याणी फाउंडेशन’ की स्थापना की । इस फाउंडेशन के जरिए उन्होंने दरभंगा राज की अमूल्य साहित्यिक और सांस्कृतिक संपदा को दुनिया के सामने रखा।

  • कल्याणी पुस्तकालय: उन्होंने अपनी निजी लाइब्रेरी को आम लोगों और शोधकर्ताओं के लिए खोल दिया, जिसमें 15,000 से अधिक दुर्लभ किताबें और पांडुलिपियाँ मौजूद हैं।
  • मैथिली भाषा का उत्थान: उनके नेतृत्व में ‘कल्याणी कोष’ (मैथिली-अंग्रेजी शब्दकोश) का प्रकाशन हुआ, जो मैथिली भाषा के संरक्षण में एक मील का पत्थर साबित हुआ।
  • कला को प्रोत्साहन: उन्होंने मिथिला पेंटिंग के कलाकारों को न केवल आर्थिक मदद दी, बल्कि इस कला को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

सादगी और फोटोग्राफी का जुनून

अरबों की संपत्ति की मालकिन होने के बावजूद महारानी कामसुंदरी देवी का जीवन सादगी की प्रतिमूर्ति था । वे अक्सर सार्वजनिक चकाचौंध से दूर रहती थीं और अपना समय पूजा-पाठ और समाज सेवा में व्यतीत करती थीं। एक रोचक तथ्य यह भी है कि वे एक बहुत अच्छी फोटोग्राफर थीं । उनके द्वारा खींची गई दुर्लभ तस्वीरें आज भी दरभंगा के शाही संग्रह और कल्याणी फाउंडेशन की दीवारों पर सजी हैं, जो उस दौर के इतिहास की झलक दिखाती हैं।

महारानी कामसुंदरी देवी : एक युग का अंत

महाराजा कामेश्वर सिंह के 1962 में हुए निधन के बाद, महारानी ने छह दशकों से अधिक का समय विधवा के रूप में बिताया। इस दौरान उन्होंने कई कानूनी संघर्ष और संपत्ति के विवाद भी झेले, लेकिन अपनी गरिमा को कभी कम नहीं होने दिया| 12 जनवरी 2026 को उनके निधन के साथ ही दरभंगा राज के 491 वर्षों के इतिहास की अंतिम जीवित कड़ी भी टूट गई | उनका अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान के साथ दरभंगा के श्यामा माई मंदिर परिसर (मध्मेश्वर मंदिर) में किया गया।

महारानी कामसुंदरी देवी को इतिहास हमेशा एक ऐसी रानी के रूप में याद रखेगा, जिन्होंने महलों में रहकर भी अपना दिल देश और जनता के लिए खुला रखा।

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