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मैथिल ब्राह्मण मछली क्यों खाते हैं?

“पग पग पोखर माछ मखान, सरस बोल मुस्की मुख पान।”​

यह सवाल भारत के अधिकांश हिस्सों में लोगों को थोड़ा अजीब लग सकता है। आमतौर पर सभी को यही सिखाया जाता है कि ब्राह्मण शाकाहारी होते हैं, लेकिन मिथिलांचल (बिहार का उत्तरी हिस्सा) में सैकड़ों साल से ब्राह्मण मछली खाते आ रहे हैं। इसके पीछे कई गहरे कारण हैं, और ये कोई अचानक बात नहीं है।

भूगोल और जलवायु के कारण

मिथिला का इलाका बाढ़ग्रस्त क्षेत्र है। इतिहास में यह जमीन लगभग हमेशा पानी से भरी रहती थी। ऐसी परिस्थिति में जब धान की खेती के लिए जमीन थी, तो दूसरी फसलें उगाना बेहद मुश्किल हो जाता था। ऐसे में मछली और चावल—ये दोनों ही चीजें लोगों के पास आसानी से मिल जाती थीं। पोखरों (तालाबों) में साल भर मछली रहती थी, और ये आसानी से उपलब्ध प्रोटीन का स्रोत था। इसलिए मजबूरी भी थी, लेकिन उपलब्धता भी थी।

संस्कृति में मछली की गहरी जड़ें

मैथिल समाज में मछली सिर्फ खाने की चीज नहीं है—यह संस्कृति का एक अभिन्न अंग बन गई है। मिथिला की प्रसिद्ध परंपरागत पेंटिंग्स में मछली का चित्र बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। एक पुरानी कहावत है: “मिथिला में तीन बातों की खास पहचान है—पग (पाग/साड़ी), पोखर (तालाब) और माछ (मछली)” ।

मिथिला पेंटिंग में मछली को शुभ माना जाता है, और यह केवल कला में नहीं—त्योहारों, विवाह समारोहों और महत्वपूर्ण रीति-रिवाजों में भी मछली आवश्यक है।

शास्त्रीय आधार

यहाँ एक दिलचस्प बात है। प्राचीन हिंदू ग्रंथों में भी मछली को विशेष महत्व दिया गया है। मनुस्मृति में कुछ विशेष प्रकार की मछलियों का नाम लेकर कहा गया है कि इन्हें देवताओं को अर्पित करके खाया जा सकता है। ये मछलियाँ हैं—राजीव, सिंघ, तुंड, सशल्क, पतिन और रोहू।

मैथिल ब्राह्मणों की परंपरा में श्राद्ध (पितरों को अर्पित किए जाने वाले भोजन) में भी मछली का विशेष स्थान है। यजन्वाल्क्य नाम के प्राचीन ऋषि को मैथिल समाज से जुड़ा माना जाता है, और उन्होंने भी अपने लेखन में मछली को खाने योग्य माना है।

व्यावहारिक जीवन की परंपरा

मछली मैथिल ब्राह्मणों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है। जन्म से लेकर विवाह, जनेऊ की रस्म से लेकर श्राद्ध तक—हर महत्वपूर्ण पल में भोजन में मछली शामिल होती है। यह केवल खान-पान का मामला नहीं, बल्कि पहचान का सवाल है। एक पुरानी कहावत है: “छठिहार से लेकर कटिहारी तक मछली का प्रमाण है”—यानी जन्म के छठे दिन (छठिहार) से लेकर विवाह के बाद की रस्मों (कटिहारी) तक, हर अवसर पर मछली आती है।

क्या ये बदल रहा है?

जैसे-जैसे आधुनिक समय आया, अब मिथिलांचल में परिवहन बेहतर हुआ, विभिन्न प्रकार की सब्जियाँ और अनाज आसानी से मिलने लगे। कई मैथिल ब्राह्मण परिवार अब शाकाहारी हो गए हैं या सिर्फ खास अवसरों पर मछली खाते हैं। लेकिन परंपरा अभी भी जीवंत है, और इसे पूरी तरह छोड़ना संस्कृति से अलग होने जैसा माना जाता है।​

मैथिल ब्राह्मण मछली खाते हैं—यह न तो कोई नई बात है, न ही कोई गलती। यह हजारों साल की परंपरा, भूगोलीय परिस्थितियों, और शास्त्रीय ग्रंथों का एक प्राकृतिक मेल है। यह दिखाता है कि भारतीय संस्कृति कितनी विविध है और हर क्षेत्र की अपनी परंपराएं हो सकती हैं। मिथिला के लिए मछली सिर्फ भोजन नहीं—यह उनकी पहचान का हिस्सा है।

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