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मिथिला मखान: संस्कृति, स्वाद और GI टैग का महत्त्व

मिथिला का नाम लो और मखान का ज़िक्र ना हो, ऐसा तो हो ही नहीं सकता। यहाँ तो कहावत भी है – “पग-पग पोखर, माछ, मखान”। मतलब हर कदम पर पोखरा, मछली और मखान मिलेगा। यही बताता है कि मखाना यहाँ की ज़िंदगी का हिस्सा है, सिर्फ खाने की चीज़ नहीं।

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2022 में इसे GI टैग भी मिल गया। अब इसे मिथिला मखान के नाम से जाना जाने लगा है। इसका मतलब ये हुआ कि अब दुनियाभर में मान्यता है कि असली मखाना तो मिथिला का ही है। किसानों के लिए ये किसी इनाम से कम नहीं। पहले जहाँ सही दाम मिलना मुश्किल था, अब हालात बेहतर हो रहे हैं।

अब केंद्र सरकार ने भी इसकी अहमियत को समझा है। 2025 के केंद्रीय बजट में बिहार के लिए ‘मखाना बोर्ड‘ बनाने की घोषणा की गई है। इस बोर्ड से मखान किसानों को सीधा बाजार मिलेगा, सही मूल्य मिलेगा और मखान industry को नई दिशा मिलेगी। इससे किसानों को भी फायदा होगा और साथ ही मखान के export को और बढ़ावा मिलेगा।

वैसे मखान दिखने में जितना सिंपल लगे, उतना आसान है नहीं। तालाब में गोता लगाना, बीज निकालना, सुखाना, फिर उसे भून-फोड़कर सफेद मोती जैसे दाने बनाना पूरा प्रोसेस महीनों की मेहनत माँगता है

आज ये दुनिया का superfood बन चुका है। जिम वाले लोग इसे low-calorie, high-protein snack मानते हैं। USA, Japan, Australia तक इसकी demand है।

लेकिन मिथिला के लिए ये हमारी daily life और पूजा की थाली का हिस्सा है। और पूजा-पाठ की बात करो तो मखान का नाम सबसे ऊपर आता है। चाहे कोई भी व्रत या पूजा हो, मखान हमेशा थाली में ज़रूर होता है। सबसे स्वादिष्ट होता है मखान की खीर।

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