Mobile Only Menu
  • Home
  • संस्कृति
  • टिकुली आर्ट: बिहार की वो बिंदी जो सिर्फ सजावट नहीं है
tikuli art

टिकुली आर्ट: बिहार की वो बिंदी जो सिर्फ सजावट नहीं है

बिहार में एक कला है जिसके बारे में सुनते ही आपको लगेगा कि ये तो सिर्फ बिंदी है। लेकिन नहीं भैया, यह सिर्फ बिंदी नहीं है। यह 800 साल की कहानी है—महिलाओं की, हाथों की कारीगरी की, और एक पूरी संस्कृति की। यह है टिकुली आर्ट।

tikuli art

असली नाम तो भोजपुरी में है

“टिकुली” का मतलब होता है बिंदी—वो छोटी सी बिंदी जो हमारी दादियां, मांएं और बहुएं अपने माथे पर लगाती हैं। लेकिन पुरानी बात में यह सिर्फ सजावट नहीं थी। यह बताती थी कि औरत कौन है—उसका रुतबा क्या है, वह किस घर से है। पहनना था यार, तो सही टिकुली पहननी होती थी।

मौर्य काल से शुरुआत

इतिहास में देखो तो यह कला सीधे मगध साम्राज्य से जुड़ी है। मौर्य काल की रानियां इसे पहनती थीं। जब चंद्रगुप्त मौर्य की रानी दरबार में आती थी, तो उसकी टिकुली कितनी शानदार होती होगी! सोने की परत और कीमती पत्थरों से सजी, बस एक नजर से पता चल जाता था कि यह कोई साधारण महिला नहीं है।

फिर मुगलों का समय आया। और भई, मुगलों को तो बड़े-बड़े सौंदर्य के काम पसंद थे। उन्होंने भी इस कला को खूब मान दिया। तब पटना से सोने की टिकुली दूर-दूर तक जाती थी। व्यापारी इसे खरीदने के लिए लंबी दूरी से पटना आते थे—क्योंकि असली टिकुली तो यहीं बनती थी।

कांच और सोने का सफर

पहले की टिकुली बनाना कोई आसान काम नहीं था। कांच पिघलाना, फिर उसे हल्के-हल्के से गोल टुकड़ों में काटना। इसके बाद आती थीं महिलाएं। बांस की नुकीली सींकों से वह बेहद नाजुक डिजाइन खींचती थीं। प्राकृतिक रंग भरे जाते—केसरिया, नीला, हरा, सोना। आखिर में सोने की पतली पर्त चढ़ाई जाती थी। एक अकेली टिकुली बनाने में 1.5 हफ्ता लग जाता था। हर कदम में माहिरी चाहिए थी, धैर्य चाहिए था। यह सिर्फ काम नहीं था—यह कला का इम्तिहान था।

अंग्रेजों के आने का दहशत

फिर जब अंग्रेज आए, तो सब कुछ बदल गया। इंग्लैंड से मशीन से बनी चीजें आने लगीं। सोना महंगा हो गया, सोने की परत लगाना भी महंगा हो गया। कारीगरों को लागत ही निकालना मुश्किल हो गया। धीरे-धीरे यह कला मरने लगी। ऐसा लगा कि टिकुली अब बस इतिहास की बात रह जाएगी।

उपेंद्र महारथी का सपना

लेकिन तभी 1954 में आया एक आदमी—उपेंद्र महारथी। भोजपुर के कलाकार। उन्हें लगा कि यह कला खत्म हो रही है। तो वह जापान चले गए। वहां देखा कि लकड़ी पर पेंटिंग कैसे की जाती है। समझ आ गया। वापस आए और सोचा—अरे भई, कांच की क्या जरूरत? लकड़ी, हार्डबोर्ड पर भी हो सकता है। सोने की जगह एनामेल पेंट लगा दो। और बस, नई टिकुली का जन्म हो गया।

अशोक कुमार और शिवानी

फिर अशोक कुमार बिस्वास आए—एक ऐसा आदमी जो सिर्फ कला नहीं, समाज के बारे में भी सोचता था। उन्होंने और उनकी पत्नी शिवानी ने मिलकर 300 से भी ज्यादा महिलाओं को इस कला सिखाई। गांवों में, शहरों में—हर जगह महिलाएं अब टिकुली बना रही थीं।

आधुनिक टिकुली कैसे बनती है?

हार्डबोर्ड को सही शक्ल दो—गोल हो, चौकोर हो, कुछ भी। फिर उस पर 4-5 बार पेंट लगाओ। हर बार सेंडपेपर से पॉलिश करो। फिर आते हैं डिजाइन। हाथ में ब्रश, दिमाग में डिजाइन। रंग भरो, कहीं-कहीं सोने की पर्त लगाओ, क्रिस्टल भी लगा दो। एक हफ्ता लग जाता है।

महिलाओं की जिंदगी बदलना

अब आता है सबसे खूबसूरत हिस्सा। इस कला के 98% कारीगर महिलाएं हैं। 7000 से ज्यादा। अर्ति देवी है नसरीगंज गांव में, 26 साल की। 12 साल से टिकुली बना रही है। हर महीने 9000 रुपये कमा लेती है। इसी पैसों से बच्चों की स्कूल की फीस देती है। सपना कुमारी ने टिकुली से ही स्नातक की डिग्री पूरी की है। सुमित्रा देवी के तीनों बेटियां घर से ही काम करती हैं, अपना पैसा कमाती हैं।

बिंदी से शुरुआत, अब तो सब कुछ

पहले सिर्फ बिंदी पर यह काम होता था। अब बाजार में क्या-क्या है! कोस्टर, टेबल मैट, झुमके, कपड़े, साड़ियां, पर्स, गहनों की डिब्बियां, शॉल—सब कुछ। दीवारों पर भी अब टिकुली की पेंटिंग होने लगी है। पटना, वाराणसी, कोलकाता—हर जगह इसकी डिमांड है। अब तो विदेशों से भी ऑर्डर आने लगे हैं।

बिहार की बिंदी, दुनिया की रत्न

टिकुली आर्ट सिर्फ कला नहीं है। यह एक महिला की कहानी है—जो अपने हाथों से अपना भविष्य बना रही है। 800 साल से यह छोटी-सी बिंदी बिहार की पहचान है, बिहार की शान है। और अब तो पूरी दुनिया जान गई है कि यह सिर्फ बिंदी नहीं है—यह एक कला है, एक परंपरा है, एक जीवन है।

Releated Posts

15 अप्रैल 2026 मासिक शिवरात्रि: प्रदोष व्रत के साथ बन रहा है ‘शिव योग’, जानें शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

हिंदू धर्म में शिव भक्ति के लिए वैसे तो हर दिन उत्तम है, लेकिन ‘मासिक शिवरात्रि’ का अपना…

ByByHarshvardhan Apr 6, 2026

वरूथिनी एकादशी 2026: तिथि और शुभ मुहूर्त

हिंदू पंचांग के अनुसार, 2026 में वरूथिनी एकादशी सोमवार, 13 अप्रैल को मनाई जाएगी । विशेष विवरण समय…

ByByHarshvardhan Apr 6, 2026

पापमोचनी एकादशी 2026: शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और व्रत कथा की पूरी जानकारी

वर्ष 2026 में पापमोचनी एकादशी का व्रत बहुत ही खास संयोगों के साथ आ रहा है। यह चैत्र…

ByByHarshvardhan Mar 15, 2026

मुंगेर सीताकुंड माघी मेला 2026: 31 जनवरी से शुरू, राजकीय दर्जा और पूरी जानकारी

बिहार के मुंगेर जिले में स्थित ऐतिहासिक और पौराणिक सीताकुंड परिसर एक बार फिर लाखों श्रद्धालुओं के स्वागत…

ByByManvinder Mishra Jan 30, 2026
3 Comments Text
  • Najlepszy kod polecajacy Binance says:
    Your comment is awaiting moderation. This is a preview; your comment will be visible after it has been approved.
    Thanks for sharing. I read many of your blog posts, cool, your blog is very good.
  • Binance账户 says:
    Your comment is awaiting moderation. This is a preview; your comment will be visible after it has been approved.
    Can you be more specific about the content of your article? After reading it, I still have some doubts. Hope you can help me. https://www.binance.bh/register?ref=JW3W4Y3A
  • gate io h"anvisningsbonus says:
    Your comment is awaiting moderation. This is a preview; your comment will be visible after it has been approved.
    Your point of view caught my eye and was very interesting. Thanks. I have a question for you.
  • Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    Scroll to Top