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Khesari Lal की पत्नी को टिकट और वंशवाद का चक्रव्यूह

खेसारी लाल यादव की पत्नी चंदा देवी को RJD से टिकट मिलने (खबर भले ही अभी पक्की न हो) की जो बातें चल रही हैं, वो सच में परेशान करने वाली हैं। ये सिर्फ खेसारी लाल यादव की पत्नी चंदा देवी का मामला नहीं है, बल्कि बिहार की राजनीति में वंशवाद और सेलिब्रिटी प्रेम की ये बीमारी बहुत पुरानी है। एक तरफ शत्रुघ्न सिन्हा हैं, जिनके बेटे लव सिन्हा को कांग्रेस ने सिर्फ ‘बिहारी बाबू’ का बेटा होने के आधार पर टिकट दे दिया, जबकि उनका पटना की राजनीति में कोई एक्टिव रोल नहीं रहा था। दूसरी तरफ, भोजपुरी स्टार पवन सिंह खुद चुनाव लड़ सकते हैं, इतना ही नहीं, भोजपुरी सुपरस्टार मनोज तिवारी, रवि किशन और दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’ जैसे लोग भी पहले ही पार्टियों का सहारा लेकर सांसद बन चुके हैं, और अब लोक गायिका मैथिली ठाकुर से लेकर एक्टर चिराग पासवान तक, हर किसी पर राजनीतिक दलों की नजर है—सबको पता है कि टैलेंटेड कार्यकर्ता को टिकट देने से ज्यादा सेलिब्रिटी नाम पर दांव लगाना ‘जीत का पक्का फॉर्मूला’ है।

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सवाल ये है कि क्या उनकी योग्यता भी है? इस तरह का चुनाव क्या बिहार को उस रास्ते पर ले जाएगा जिसका लोग सपना देख रहे हैं, या और पीछे धकेल देगा?

क्या बड़ी पार्टियों के पास योग्य कार्यकर्ता नहीं हैं?


अरे भाई, बिहार की इतनी पुरानी-पुरानी पार्टियां हैं—RJD, JDU ,BJP, Congress — क्या इनके पास कार्यकर्ता नहीं हैं? क्या इनके पास वो लोग नहीं हैं जो सच में योग्य हों? जो बिहार को चुनाव जिताने से लेकर विकास करने और आगे बढ़ाने में सक्षम हों?

क्यों टिकट बांटते वक्त इन पार्टियों को सेलिब्रिटीज के परिवार का या बस वंश का सहारा लेना पड़ता है?

जवाब सीधा है: पार्टियां जीत की गारंटी चाहती हैं। उन्हें लगता है कि एक प्रसिद्ध चेहरा ज्यादा वोट खींचेगा, भले ही वो कार्यकर्ता जिसने साल भर काम किया है, वो बेचारा योग्यता में कहीं आगे हो। कार्यकर्ता को सिर्फ झंडा उठाने और रैली में भीड़ जुटाने के लिए रखा जाता है।

क्या जनता बेवकूफ है या बनी रहना चाहती है?

ये सबसे बड़ा सवाल है। क्या जनता को बेवकूफ बनाया जा रहा है, या जनता खुद ही बेवकूफ बनी रहना चाहती है?

देखिए, मूवी देखना और राजनीति के टाइम पर वोट देना… ये दोनों चीजें अलग हैं। लेकिन जब टिकट ही सेलिब्रिटी के परिवार को मिलेगा, तो जनता भी स्टारडम और पहचान देखकर वोट दे देती है।

इस तरह की राजनीति बिहार को कितना आगे ले जाएगी या कितना पीछे? साफ बात है, ये सिर्फ पीछे ही खींचेगी!

टैलेंट हंट क्यों नहीं होता?


बिहार में इतने योग्य लोग हैं, इतने पढ़े-लिखे बच्चे हैं, जवान हैं। उनको सीटें क्यों नहीं मिलतीं?

जब क्रिकेट में IPL प्लेयर सिलेक्शन होता है, हर तरह का टैलेंट हंट होता है, तो ये राजनीतिक पार्टियां टैलेंट हंट क्यों नहीं चलातीं? क्यों नहीं ये योग्य लोगों को ढूंढती हैं, उन्हें पार्टी में जॉइन कराती हैं, और उन्हें आगे बढ़ाती हैं?

क्योंकि उन्हें तुरंत जीत चाहिए। योग्य लोगों को मौका देना लंबा और मुश्किल काम है, जबकि सेलिब्रिटी का परिवार तुरंत फायदा देता है।


क्या राजनीति सिर्फ चुनाव जीतने का नाम है, या सेवा भी है?

अगर इस तरह से टिकटें बँटती रहेंगी कि जब भी इलेक्शन आता है, किसी की पत्नी को टिकट दिला दिया, किसी सेलिब्रिटी पर दांव खेल दिया… तो उन कार्यकर्ताओं का क्या, जो साल भर मेहनत करते हैं?

निष्कर्ष ये है: जब तक पार्टियाँ और हम (जनता) दोनों मिलकर योग्यता को प्राथमिकता नहीं देंगे, तब तक बिहार की राजनीति ऐसे ही वंशवाद और सेलिब्रिटी के चक्कर में फँसी रहेगी, और विकास की बात सिर्फ भाषणों तक सीमित रह जाएगी।

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