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बिहार प्रमंडल नेत्रहीन विद्यालय योजना

बिहार के हर प्रमंडल में खुलेंगे आधुनिक नेत्रहीन विद्यालय: नीतीश सरकार का ऐतिहासिक फैसला

बिहार में विशेष शिक्षा और दिव्यांग कल्याण के क्षेत्र में एक नए युग की शुरुआत होने जा रही है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार ने राज्य के सभी नौ प्रशासनिक प्रमंडलों में उच्च क्षमता वाले आवासीय नेत्रहीन और मूक-बधिर विद्यालय खोलने का बड़ा फैसला लिया है। फरवरी 2026 के बजट सत्र के दौरान विधानसभा में की गई यह घोषणा बिहार के लगभग 7 लाख दृष्टिबाधित नागरिकों के लिए उम्मीद की एक नई किरण लेकर आई है।

यह पहल केवल स्कूल खोलने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दिव्यांगजनों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की एक व्यापक रणनीति का हिस्सा है।

बिहार प्रमंडल नेत्रहीन विद्यालय योजना
AI Image

500 बेड और 12वीं तक की पढ़ाई: क्या है खास?

इस योजना की सबसे बड़ी विशेषता इन स्कूलों की क्षमता और शिक्षा का स्तर है। सामाजिक कल्याण विभाग के अनुसार, प्रत्येक प्रमंडलीय स्कूल में 500 बेड की आवासीय सुविधा होगी। इसका मतलब है कि अब बच्चों को पढ़ाई के लिए अपने घर से बहुत दूर पटना या दूसरे राज्यों का रुख नहीं करना पड़ेगा।

इसके अलावा, सरकार ने इन स्कूलों को ‘प्लस टू’ (12वीं कक्षा) तक अपग्रेड करने का निर्णय लिया है। पहले बिहार में विशेष स्कूलों की कमी और केवल 10वीं तक की पढ़ाई होने के कारण दृष्टिबाधित छात्र उच्च शिक्षा से वंचित रह जाते थे। अब 12वीं तक की निरंतर शिक्षा सुनिश्चित होने से उनके लिए कॉलेज और यूनिवर्सिटी के रास्ते आसान हो जाएंगे।

बिहार के 9 प्रमंडलों में बिखरेगा शिक्षा का उजियारा

वर्तमान में बिहार में सरकारी स्तर पर केवल तीन नेत्रहीन विद्यालय संचालित हैं—पटना, दरभंगा और भागलपुर में। ये स्कूल केवल लड़कों के लिए हैं और इनमें सीटों की संख्या भी बहुत कम है। नई योजना के तहत निम्नलिखित प्रमंडलों में आधुनिक स्कूल बनाए जाएंगे:

  1. पटना
  2. मगध (गया)
  3. सारण (छपरा)
  4. तिरहुत (मुजफ्फरपुर)
  5. दरभंगा
  6. कोसी (सहरसा)
  7. पूर्णिया
  8. भागलपुर
  9. मुंगेर

इनमें से 5 स्कूल लड़कियों के लिए और 4 स्कूल लड़कों के लिए विशेष रूप से डिजाइन किए जा सकते हैं, ताकि लैंगिक समानता बनी रहे।

दिव्यांगता के नियमों में बड़ा बदलाव

इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ-साथ सरकार ने नीतिगत स्तर पर भी क्रांतिकारी बदलाव किए हैं। अब तक सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए न्यूनतम 60% दिव्यांगता अनिवार्य थी, जिसे घटाकर अब 40% कर दिया गया है। इस फैसले से लाभार्थियों की संख्या लगभग दोगुनी हो जाएगी।

साथ ही, सरकार ने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे दिव्यांग छात्रों के लिए प्रोत्साहन राशि की भी घोषणा की है:

  • UPSC पीटी (Prelims) पास करने पर: 1 लाख रुपये
  • BPSC पीटी (Prelims) पास करने पर: 50,000 रुपये

7,279 विशेष शिक्षकों की बहाली और आधुनिक तकनीक

स्कूलों की इमारत खड़ी करना काफी नहीं है, उन्हें चलाने के लिए विशेषज्ञ शिक्षकों की जरूरत होती है। इसी को ध्यान में रखते हुए बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC) ने 7,279 विशेष स्कूल शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया शुरू की है। इनमें कक्षा 1 से 5 के लिए 5,534 पद और कक्षा 6 से 8 के लिए 1,745 पद शामिल हैं। इन शिक्षकों को ‘क्रॉस-डिसेबिलिटी’ ट्रेनिंग दी जाएगी ताकि वे विभिन्न प्रकार की दिव्यांगता वाले बच्चों को बेहतर ढंग से संभाल सकें।

तकनीक के मोर्चे पर, इन स्कूलों को ‘ब्रेल प्रेस’ और आधुनिक सहायक उपकरणों से लैस किया जाएगा। ‘प्रोजेक्ट साथी’ और ‘सुगम्य पुस्तकालय’ जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए छात्रों को ऑडियो बुक्स और टॉकिंग लैपटॉप उपलब्ध कराए जाएंगे।

सात निश्चय-3: विकसित बिहार का विजन

यह पूरी योजना नीतीश सरकार के ‘सात निश्चय-3’ (2025-2030) के रोडमैप का हिस्सा है। इस चरण में सरकार का ध्यान ‘उन्नत शिक्षा – उज्ज्वल भविष्य’ पर है। वित्त वर्ष 2026-27 के बजट में शिक्षा विभाग को 68,216 करोड़ रुपये का रिकॉर्ड आवंटन मिला है, जो कुल बजट का लगभग 20% है। सामाजिक कल्याण विभाग को भी 7,724 करोड़ रुपये मिले हैं, जिससे इन स्कूलों के निर्माण और संचालन का रास्ता साफ हो गया है।

चुनौतियां और भविष्य की राह

योजना शानदार है, लेकिन इसकी सफलता इसके क्रियान्वयन (Implementation) पर निर्भर करती है। अतीत में पटना के कदमकुआं स्थित नेत्रहीन स्कूल में शिक्षकों की कमी और खराब सुविधाओं को लेकर पटना हाई कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई थी। नई योजना में प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि स्कूलों में न केवल आधुनिक इमारतें हों, बल्कि योग्य शिक्षक और संवेदनशील स्टाफ भी मौजूद रहे।

बिहार प्रमंडल नेत्रहीन विद्यालय योजना राज्य के समावेशी विकास (Inclusive Development) की दिशा में एक बड़ा कदम है। 500 बेड की क्षमता और 12वीं तक की शिक्षा के साथ ये संस्थान बिहार के दिव्यांग बच्चों को केवल अक्षर ज्ञान ही नहीं देंगे, बल्कि उन्हें सम्मान के साथ जीने का हुनर भी सिखाएंगे। 2030 तक ‘विकसित बिहार’ के सपने को सच करने के लिए समाज के हर वर्ग, विशेषकर दिव्यांगजनों की भागीदारी अनिवार्य है।

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