दिसंबर 2025 में अचानक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) पर एक ऐसा भूचाल आया जिसने भारतीय जनता पार्टी (BJP) की नींद उड़ा दी है। #BJPHatesBrahmin न केवल ट्रेंड कर रहा है, बल्कि यह भाजपा के उस “कोर वोट बैंक” के गुस्से का इजहार है जो दशकों से पार्टी की रीढ़ रहा है। आखिर ऐसा क्या हुआ कि जो समाज हमेशा ‘कमल’ के साथ खड़ा रहा, वो आज पार्टी के खिलाफ मोर्चा खोलकर बैठा है?
इस डिजिटल विद्रोह के पीछे कोई एक वजह नहीं है, बल्कि बिहार से लेकर कर्नाटक और मध्य प्रदेश तक घटी घटनाओं की एक पूरी श्रृंखला है। आइए, आसान भाषा में समझते हैं इस ट्रेंड की पूरी इनसाइड स्टोरी।

बिहार का ‘विद्रोह’: R.K. Singh का अपमान और इस्तीफा
इस आग में घी डालने का काम किया है बिहार की राजनीति ने। पूर्व केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ नेता आर.के. सिंह (R.K. Singh) का भाजपा से इस्तीफा देना ब्राह्मण समाज के लिए एक बड़ा झटका साबित हुआ। आर.के. सिंह सिर्फ एक नेता नहीं, बल्कि एक पूर्व IAS अधिकारी और एक ईमानदार प्रशासक की छवि रखते हैं।
मामला तब बिगड़ा जब आर.के. सिंह ने 2025 के बिहार विधानसभा चुनावों के दौरान टिकट बंटवारे पर सवाल उठाए। उनका कहना था कि पार्टी ने “ईमानदार” कार्यकर्ताओं को छोड़कर “दागी” और “अपराधी” छवि वाले उम्मीदवारों (जैसे अनंत सिंह और अन्य बाहुबली) को टिकट दिया है। उन्होंने साफ कहा था, “इन लोगों को वोट देने से अच्छा है कि तालाब में डूब मरें।”
पार्टी ने उनकी नैतिक बात सुनने के बजाय उन्हें “पार्टी विरोधी गतिविधियों” के लिए सस्पेंड कर दिया। ब्राह्मण समाज ने इसे दिल पर ले लिया। उन्हें लगा कि भाजपा ने एक विद्वान और नीतिवान ब्राह्मण नेता का अपमान किया है ताकि वह ओबीसी (OBC) नेताओं और बाहुबलियों को खुश रख सके। यह घटना इस ट्रेंड का सबसे तात्कालिक और बड़ा कारण बनी।
2. कर्नाटक का ‘ कानून’: मठों और मंदिरों पर खतरा?
दक्षिण भारत से भी नाराजगी की तेज लहर उठी है। कर्नाटक सरकार द्वारा “Karnataka Hate Speech and Hate Crimes (Prevention) Bill, 2025” पास किया जाना ब्राह्मण समुदाय के लिए चिंता का विषय बन गया है।
वैसे तो यह बिल हेट स्पीच रोकने के लिए है, लेकिन इसके प्रावधानों ने डर पैदा कर दिया है। इसमें “Collective Liability” (सामूहिक जिम्मेदारी) का क्लॉज है। इसका मतलब है कि अगर किसी संस्था (जैसे कोई मठ या ट्रस्ट) का कोई सदस्य कुछ विवादित बोलता है, तो पूरी संस्था पर कार्रवाई हो सकती है।
ब्राह्मण बुद्धिजीवियों और संतों को डर है कि इसका इस्तेमाल उनके धार्मिक प्रवचनों, शास्त्रों के पाठ या सनातन धर्म की रक्षा में दिए गए बयानों को “हेट स्पीच” बताकर उन्हें जेल भेजने के लिए किया जा सकता है। हालाँकि भाजपा विपक्ष में है, लेकिन सोशल मीडिया पर लोगों का आरोप है कि केंद्र में भारी बहुमत होने के बावजूद भाजपा अपने ही कोर वोटर्स को बचाने के लिए ठोस कदम नहीं उठा रही है।
3. “यूज एंड थ्रो” की नीति: टिकटों में कटौती
यह नाराजगी सिर्फ बयानों तक सीमित नहीं है, बल्कि सत्ता में हिस्सेदारी को लेकर भी है। उत्तर प्रदेश से लेकर राजस्थान और बिहार तक, ब्राह्मण समाज को लग रहा है कि भाजपा अब उनका इस्तेमाल सिर्फ वोट लेने के लिए करती है, लेकिन सत्ता देने के समय उन्हें दरकिनार कर दिया जाता है।
इस भावना को “मंडल-2” या भाजपा का “ओबीसी-करण” कहा जा रहा है। 2024 और 2025 के चुनावों में देखा गया कि भाजपा ने यादवों और अन्य ओबीसी जातियों को लुभाने के लिए ब्राह्मणों के टिकट काट दिए। मैसूरु (कर्नाटक) में वरिष्ठ विधायक एस.ए. रामदास (S.A. Ramdas) का टिकट कटना इसका एक बड़ा उदाहरण बना, जहां समुदाय ने साफ चेतावनी दी थी कि अगर उन्हें अनदेखा किया गया तो परिणाम भुगतने होंगे।
लोगों का कहना है कि “हमे दरी बिछाने और जयकारा लगाने के लिए रखा गया है, जबकि मलाईदार पद दूसरों को दिए जा रहे हैं।”
4. अपमान पर चुप्पी: जीतन राम मांझी और संतोष वर्मा प्रकरण
सांस्कृतिक सम्मान ब्राह्मण समाज के लिए बहुत मायने रखता है, और यहाँ भाजपा अपने सहयोगियों को चुप कराने में विफल रही है।
- जीतन राम मांझी: भाजपा के सहयोगी और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने ब्राह्मणों के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणियां कीं (जैसे कि वे मांस-मदिरा का सेवन करते हैं और ढोंगी हैं)। सोशल मीडिया पर सवाल यह है कि अगर किसी ने दलितों या ओबीसी के खिलाफ ऐसा बोला होता तो भाजपा तुरंत कार्रवाई करती, लेकिन मांझी अभी भी मंत्री हैं। इस “दोहरे मापदंड” ने आग में घी का काम किया।
- मध्य प्रदेश IAS कांड: मध्य प्रदेश में एक सीनियर IAS अधिकारी संतोष वर्मा ने भरी सभा में कहा कि “आरक्षण तब तक जारी रहना चाहिए जब तक ब्राह्मण अपनी बेटी मेरे बेटे को न दे दे।” हालांकि राज्य सरकार ने विरोध के बाद उन्हें पद से हटा दिया और बर्खास्तगी की सिफारिश की, लेकिन ऐसे बयानों का बार-बार आना समाज को यह सोचने पर मजबूर कर रहा है कि भाजपा राज में उनका सामाजिक सम्मान सुरक्षित नहीं है।
5. राजस्थान और यूपी में “ठाकुरवाद” का आरोप
उत्तर प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में एक और नैरेटिव चल रहा है। यूपी में योगी आदित्यनाथ के शासन को सोशल मीडिया का एक धड़ा “ठाकुरवाद” के रूप में देख रहा है। आए दिन “ब्राह्मण उत्पीड़न” की खबरें और कानपुर के खुशी दुबे जैसे मामले इस ट्रेंड का हिस्सा बन जाते हैं।
राजस्थान में ब्राह्मण महापंचायत ने अपनी ताकत दिखाई थी और 30-40 टिकटों की मांग की थी, लेकिन उन्हें लगा कि पार्टी ने उनकी संख्याबल के हिसाब से उन्हें प्रतिनिधित्व नहीं दिया। जयपुर में पुजारी और भाजपा विधायक बालमुकुंद आचार्य पर पुलिस कार्रवाई ने भी यह संदेश दिया कि भाजपा राज में भी भगवा धारी सुरक्षित नहीं हैं।


















