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पटना का वो हिजाब वाला हादसा और जावेद का स्टैंड

बुर्का मर्जी या मजबूरी? जावेद अख्तर की ‘Social Conditioning’ वाली बहस का पूरा सच

दोस्तो, सोशल मीडिया पर आजकल एक पुरानी बहस ने फिर से तूल पकड़ लिया है। हाल ही में Javed Akhtar sparked a debate जब उन्होंने महिलाओं के चेहरा ढकने की परंपरा पर सीधा सवाल उठा दिया। उन्होंने इसे सिर्फ एक ‘पर्सनल चॉइस’ मानने से इनकार कर दिया और कहा कि यह असल में ‘सोशल कंडिशनिंग’ और ‘पीयर प्रेशर’ का नतीजा है।

एक वाइज दोस्त की तरह अगर हम इस मामले को देखें, तो यह बहस सिर्फ कपड़ों के बारे में नहीं है, बल्कि यह हमारी ‘आजादी’ और ‘पहचान’ की गहराई तक जाती है। चलिए, इस मुद्दे की परतों को थोड़ा प्यार से और ईमानदारी से खोलते हैं।

पटना का वो हिजाब वाला हादसा और जावेद का स्टैंड

भुवनेश्वर का वो लिटरेरी फेस्टिवल और कड़वे सवाल

भुवनेश्वर में SOA लिटरेरी फेस्टिवल चल रहा था। वहां जावेद साहब ने एक बहुत ही चुभता हुआ सवाल पूछा—”किसी महिला को अपने चेहरे से शर्मिंदगी क्यों होनी चाहिए?” उनका तर्क था कि चेहरा ही इंसान की असली पहचान है, उसके इमोशन्स का केंद्र है। तो फिर उसे छुपाने की जरूरत क्या है?

वहां मौजूद एक स्टूडेंट ने जब उनसे पूछा कि क्या पर्दा करने से कोई औरत ‘कमजोर’ हो जाती है, तो उनका जवाब बड़ा सीधा था। उन्होंने कहा कि कपड़ों में शालीनता (decency) जरूरी है—चाहे वो मर्द हों या औरत। जैसे किसी ऑफिस में शॉर्ट्स पहनकर जाना ‘डिग्निफाइड’ नहीं लगता, वैसे ही सबको सलीके से रहना चाहिए। लेकिन ‘शालीनता’ और ‘चेहरा छुपाने’ में बहुत बड़ा फर्क है।

क्या हम सच में ‘Brainwashed’ हैं?

जावेद अख्तर का सबसे विवादास्पद बयान यही था कि जो महिलाएं कहती हैं कि वो अपनी मर्जी से बुर्का या नकाब पहन रही हैं, वो असल में ‘ब्रेनवॉश्ड’ हैं। उनका मानना है कि कोई भी फैसला ‘वैक्यूम’ (खालीपन) में नहीं लिया जाता। हम वही करना चाहते हैं जिससे हमारे आसपास के लोग, हमारी फैमिली और दोस्त हमें ‘शाबाशी’ दें या हमें पसंद करें।

इसे उन्होंने ‘पीयर प्रेशर’ का नाम दिया। उनके मुताबिक, अगर समाज का दबाव हटा दिया जाए, तो शायद ही कोई महिला अपना चेहरा छुपाना चाहेगी। यह बात सुनने में थोड़ी सख्त लग सकती है, लेकिन सोचने वाली तो है ही। क्या हमारी चॉइस सच में हमारी अपनी होती है, या हम सिर्फ वही कर रहे हैं जो हमें बचपन से सिखाया गया है?

पटना का वो हिजाब वाला हादसा और जावेद का स्टैंड

इस बहस के बीच दिसंबर 2025 में पटना में एक अजीब वाकया हुआ। बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने एक सरकारी प्रोग्राम में एक लेडी डॉक्टर का हिजाब खींचकर नीचे कर दिया। इस पर काफी हंगामा हुआ।

हैरानी की बात यह थी कि जावेद अख्तर, जो खुद पर्दे के खिलाफ हैं, उन्होंने नीतीश कुमार की इस हरकत की कड़ी निंदा की। उन्होंने साफ कहा कि “मैं पर्दे के खिलाफ हूं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कोई मर्द किसी महिला को उसकी मर्जी के बिना छुए या उसका पर्दा हटाए।” यहां उन्होंने एक बहुत जरूरी बात सिखाई—आप किसी विचार के खिलाफ हो सकते हैं, लेकिन किसी इंसान की ‘डिग्निटी’ और ‘कंसेंट’ (सहमति) सबसे ऊपर है।

2019 की यादें: बुर्का और घूंघट एक ही सिक्के के दो पहलू?

यह पहली बार नहीं है जब उन्होंने ऐसी बात कही। मई 2019 में जब शिव सेना ने बुर्का बैन करने की मांग की थी, तब जावेद साहब ने कहा था कि अगर बुर्का बंद करना है, तो राजस्थान का ‘घूंघट’ भी बंद होना चाहिए।

उनका यह ‘बैलेंस्ड अप्रोच’ कट्टरपंथियों को रास नहीं आता। इसीलिए उन्हें कभी हिंदू संगठनों से धमकियां मिलती हैं, तो कभी मुस्लिम धर्मगुरु उन्हें ‘काफिर’ कहते हैं। हाल ही में कोलकाता में उनका एक प्रोग्राम सिर्फ इसलिए कैंसिल कर दिया गया क्योंकि कुछ लोग उनके ‘नास्तिक’ होने से नाराज थे।

क्या कहता है फेमिनिस्ट नजरिया?

इस मामले में फेमिनिस्ट्स की राय भी बंटी हुई है। कुछ का कहना है कि हिजाब या बुर्का ‘पितृसत्ता’ (patriarchy) का प्रतीक है और इसे पहनना आजादी नहीं है। वहीं, कुछ महिलाएं इसे अपनी ‘पहचान’ (identity) और ‘इस्लामिक फ्रीडम’ की तरह देखती हैं, खासकर उन देशों में जहां मुसलमानों के खिलाफ भेदभाव होता है।

भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन (BMMA) जैसी संस्थाएं भी बीच का रास्ता ढूंढ रही हैं। वो कहती हैं कि असली लड़ाई कपड़ों की नहीं, बल्कि हक की है—जैसे पढ़ाई, बराबरी और कानून में बराबरी का हिस्सा।

आखिर में, जावेद साहब का वो सवाल हमारे पास ही रह जाता है—”चेहरे से शर्मिंदगी क्यों?” शायद जिस दिन हम सब एक-दूसरे को सिर्फ एक इंसान की तरह देख पाएंगे, उस दिन ऐसे पर्दों की जरूरत ही नहीं रहेगी।

आप इस बारे में क्या सोचते हैं? क्या आपको भी लगता है कि हमारी बहुत सारी ‘मर्जियां’ असल में ‘सोशल कंडिशनिंग’ का हिस्सा हैं? कमेंट्स में जरूर बताएं!

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