Mobile Only Menu
  • Home
  • ब्लॉग
  • पटना गंगा पुल मामला: पुलिस की ज्यादती, कैमरे की जवाबदेही
patna police slapped rider

पटना गंगा पुल मामला: पुलिस की ज्यादती, कैमरे की जवाबदेही

क्या हुआ और प्रशासन ने कैसा एक्शन लिया

पटना के गंगा पुल पर एक पुलिसवाले ने ‘इशू’ नाम के जिस लड़के को थप्पड़ मारा, वह मामला पुलिस की ड्यूटी और सही बर्ताव में एक बड़ी चूक है। यह घटना तुरंत चर्चा में आ गई और वायरल वीडियो ने पुलिस महकमे को तुरंत हरकत में आने पर मजबूर कर दिया। इस रिपोर्ट में हम समझेंगे कि इस तरह बिना बात के हाथ उठाना, बिहार पुलिस के जवाबदेही सिस्टम में कितनी बड़ी गड़बड़ी है।

मामला क्या था?

यह पूरा मामला गंगा पुल (जो शायद महात्मा गांधी सेतु था) पर हुआ, जब एक पुलिसवाले ने किसी बात पर इशू नाम के युवक को थप्पड़ मार दिया । सबसे अहम बात यह है कि यह पूरी घटना किसी ने मोबाइल में रिकॉर्ड कर ली और वीडियो आग की तरह सोशल मीडिया पर फैल गया। जनता का गुस्सा बढ़ा तो पटना पुलिस के बड़े अफ़सरों को फौरन एक्शन लेना पड़ा।   

असली बात: सस्पेंड करना सिर्फ़ ‘मामला शांत’ करना

पुलिसवाले को तुरंत सस्पेंड कर देना ज़रूरी था, पर इसे आप सिर्फ़ ‘मामला शांत करने’ (Crisis Management) या जनता का गुस्सा ठंडा करने का तरीका समझिए । सस्पेंड करने से सिर्फ़ तुरंत का गुस्सा तो शांत हो जाता है, पर इससे वो सिस्टम की कमी दूर नहीं होती, जहाँ पुलिसवाले थप्पड़ मारने जैसी छोटी-मोटी ज़बरदस्ती को भी सही मानते हैं ।   

जब भी कोई ऐसा वीडियो वायरल होता है, तो पुलिस प्रशासन इसे ‘थोड़ी सी ग़लती’ या ‘ड्यूटी में चूक’ बताकर टालने की कोशिश करता है । ऐसा करके वे अंदरूनी विभागीय जाँच (DI) पर अपना कंट्रोल बनाए रखते हैं, और पीड़ित इशू को सीधा कोर्ट जाने और पुलिसवाले पर आपराधिक मुक़दमा चलाने का मौक़ा नहीं मिल पाता। निलंबन (सस्पेंशन) पर ज़्यादा भरोसा करने का मतलब है कि विभाग अपने अंदर की कमियों को छिपा रहा है, और जल्दी से मुक़दमा चलाने से बच रहा है।   

घटना कहाँ हुई?

मारपीट गंगा पुल पर हुई, जो पटना का एक बड़ा और बहुत व्यस्त इलाक़ा है । ऐसी जगहों पर तैनात पुलिसवालों को बहुत संयम और अच्छे बर्ताव की ज़रूरत होती है। थप्पड़ मारना, कम नुकसान पहुँचाने वाला, पर बिना इजाज़त का बल प्रयोग है ।   

IPC यानी भारतीय दंड संहिता का उल्लंघन

हमारे कानून के मुताबिक़, बिना किसी खतरे या ठोस वजह के किसी नागरिक को थप्पड़ मारना सीधा-सीधा जुर्म है, जिसे हमला या आपराधिक बल कहा जाता है । पुलिस बल का प्रयोग तभी कर सकती है, जब उन्हें अपनी सुरक्षा का खतरा हो या सामने वाला आदमी मारपीट कर रहा हो।   

ड्यूटी के नियम तोड़ना

थप्पड़ मारना सिर्फ़ जुर्म नहीं है, बल्कि यह पुलिस नियमावली और ड्यूटी के नियमों के ख़िलाफ़ भी है। पुलिस को लोगों के साथ पेशेवर तरीक़े से पेश आना होता है और जनता का विश्वास बनाए रखना होता है ।   

patna police slapped rider

प्रशासन का जवाब: निलंबन (सस्पेंशन)

पटना पुलिस ने तुरंत अधिकारी को निलंबित कर दिया, जो ऐसी घटनाओं में उठाया जाने वाला पहला कदम होता है।

निलंबन का मतलब

सस्पेंशन एक अस्थायी कार्रवाई है, जिसका मतलब सिर्फ़ यह है कि पुलिसवाला अब ड्यूटी नहीं कर पाएगा और विभागीय जाँच (DI) पर असर नहीं डाल पाएगा। यह आख़िरी सज़ा नहीं है। पर इस फ़ैसले की तेज़ी दिखाती है कि अफ़सरों को सबसे ज़्यादा चिंता वीडियो वायरल होने के बाद अपनी इमेज की थी ।   

पहले भी ऐसा हुआ है

यह कोई नई बात नहीं है। बिहार में पहले भी एक थाना प्रभारी (SHO) को रेस्टोरेंट में लोगों से बदतमीज़ी का वीडियो वायरल होने के बाद सस्पेंड किया गया था । इससे साफ़ है कि पुलिस तभी तुरंत एक्शन लेती है, जब जनता का दबाव वीडियो के ज़रिए बहुत ज़्यादा बढ़ जाता है।   

कैमरा ने कैसे बदल दी जवाबदेही

गंगा पुल की घटना दिखाती है कि मोबाइल फोन के कैमरे कैसे पुलिस की जवाबदेही तय करने में सबसे बड़े ‘निगरानीकर्ता’ बन गए हैं।

‘वायरल वीडियो’ का ज़बरदस्त असर

वीडियो का तुरंत फैलना ही प्रशासन को एक्शन लेने के लिए मजबूर करता है। यह एक तरह से बाहरी दबाव का काम करता है, जो पुलिस की अंदरूनी, धीमी और अक्सर टालमटोल वाली शिकायत प्रक्रिया को दरकिनार कर देता है।

तेज़ी से लिया गया एक्शन

पटना एसएसपी ने वीडियो की वायरल स्पीड के हिसाब से ही तुरंत सस्पेंशन का आदेश दिया । ऐसा ही बेंगलुरु में हुआ, जहाँ एक ट्रैफिक पुलिसवाले ने युवक को थप्पड़ मारा और तुरंत सस्पेंड हो गया । बिहार के कटिहार में भी दो पुलिसकर्मी एक मानसिक रूप से कमजोर आदमी को बुरी तरह पीटते हुए कैमरे में कैद हुए तो उन्हें भी सस्पेंड कर दिया गया । यानी, पुलिस तब तक नहीं जागती, जब तक जनता वीडियो बनाकर उन्हें जगाती नहीं है।   

बिहार पुलिस में सुधार के लिए ज़रूरी क़दम

पटना पुलिस को सिर्फ़ घटना होने पर एक्शन लेने वाले विभाग से एक ज़िम्मेदार संस्था बनाने के लिए ये सुधार करने होंगे:

पुलिस शिकायत प्राधिकरण (PCA) को ताक़त देना

जब भी सार्वजनिक तौर पर मारपीट का वीडियो वायरल हो, तो PCA को खुद से जाँच शुरू करने का अधिकार होना चाहिए।

मजिस्ट्रेट से जाँच ज़रूरी

इशू जैसे हर मामले में, जहाँ किसी नागरिक पर पब्लिक में बल प्रयोग हुआ हो, एक पुलिस से बिल्कुल अलग, निष्पक्ष मजिस्ट्रेट जाँच तुरंत शुरू की जानी चाहिए।

बॉडी-वॉर्न कैमरे (BWCs) लगाना

गंगा सेतु जैसी सभी व्यस्त जगहों पर तैनात पुलिसवालों के लिए अनिवार्य रूप से बॉडी-वॉर्न कैमरे लगाए जाएँ। इससे सब कुछ रिकॉर्ड होगा।

बिहार पुलिस को साफ़-साफ़ नियम बनाने होंगे। इसमें थप्पड़ मारना, धक्का देना जैसे कामों को गैर-कानूनी हमला माना जाए।

Releated Posts

बिहार ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (GCC) पॉलिसी 2026: अब बिहार बनेगा नया IT हब, युवाओं के लिए खुलेंगे नौकरियों के द्वार!

29 जनवरी 2026 का दिन बिहार के औद्योगिक विकास के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हुआ। मुख्यमंत्री नीतीश…

ByByPrachi Singh Feb 9, 2026

मुख्यमंत्री निश्चय स्वयं सहायता भत्ता योजना 2026: बिहार के युवाओं को मिल रहे ₹1000 हर महीने, जानें पूरी जानकारी

बिहार सरकार ने राज्य के युवाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर और हुनरमंद बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण…

ByByManvinder Mishra Feb 8, 2026

बिहार की बेटी अनु कुमारी: संघर्ष से विश्व विजेता बनने और 23.43 लाख का इनाम पाने की पूरी कहानी

बिहार की मिट्टी ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि अगर इरादे बुलंद हों, तो कोई…

ByByHarshvardhan Feb 7, 2026

मुख्यमंत्री कन्या उत्थान योजना: ₹50,000 के लिए 15 फरवरी तक करें आवेदन, जानें स्टेप-बाय-स्टेप प्रोसेस

बिहार सरकार की सबसे महत्वाकांक्षी योजनाओं में से एक, मुख्यमंत्री कन्या उत्थान योजना (MKUY), राज्य की बेटियों के…

ByByPrachi Singh Feb 5, 2026

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top