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संजय यादव : तेजस्वी यादव के सलाहकार और बिहार की राजनीति मास्टरमाइंड

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शुरुआती जीवन और शिक्षा


संजय यादव का जन्म 24 फरवरी 1984 को हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले के नांगल सिरोही गांव में हुआ। उनके पिता का नाम प्रभाती लाल यादव और माता का नाम बसंती देवी है। उनका कोई खास राजनीतिक पारिवारिक बैकग्राउंड नहीं था – उनके स्वर्गीय पिता केवल 2000 में एक बार गांव की पंचायत में पंच बने थे।​

संजय ने भोपाल के माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से कंप्यूटर साइंस में एमएससी की डिग्री ली और एमबीए भी किया। शुरुआत में उन्होंने दिल्ली की मल्टीनेशनल कंपनियों में काम किया। उनकी शादी 20 जून 2014 को सुनिष्ठा से हुई और उनके दो बच्चे हैं – बेटे का नाम मिराया राव और बेटी का नाम तान्या राओ है। वे दिल्ली के नजफगढ़ इलाके में टोडरमल कॉलोनी में रहते हैं।​

तेजस्वी यादव से दोस्ती और राजनीति में प्रवेश


संजय यादव की मुलाकात तेजस्वी यादव से 2012 में दिल्ली में हुई, जब तेजस्वी इंडियन प्रीमियर लीग में दिल्ली डेयरडेविल्स के लिए खेल रहे थे। दोनों की दोस्ती म्युचुअल फ्रेंड्स की सोशल मीटिंग्स में शुरू हुई। शुरुआत में संजय ऑन-ऑफ बेसिस पर तेजस्वी के लिए काम करते थे, लेकिन 2013 में जब लालू प्रसाद यादव जेल गए तो तेजस्वी ने संजय से फुल टाइम जुड़ने का अनुरोध किया।​

इसके बाद संजय ने अपनी आईटी कंपनी की नौकरी छोड़ दी और पटना चले आए। 2012 से ही वे आरजेडी से जुड़ गए और तेजस्वी के राजनीतिक सलाहकार के रूप में काम करने लगे।​

2015 का चुनाव: पहली बड़ी सफलता


संजय यादव की राजनीतिक समझ का पहला बड़ा प्रमाण 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में मिला। आरजेडी 2010 के चुनाव में केवल 22 सीटें जीत पाई थी और लगभग 60 सीटों पर 10,000 से कम मतों से हार गई थी। संजय ने इस डेटा का विश्लेषण किया और पार्टी की रणनीति में बदलाव किए।​

2015 के चुनाव के अंतिम चरण से ठीक पहले संजय यादव ने लालू प्रसाद को एक अहम जानकारी दी – आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा की जरूरत पर बात की थी। यह खबर तब ज्यादा चर्चा में नहीं थी। लेकिन संजय ने इसे लालू के सामने रखा और उन्होंने खुशी से भोजपुरी में कहा – “बड़का मुद्दा मिल गेल बा” (बड़ा मुद्दा मिल गया है)।​

आरजेडी ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया और सीमांचल क्षेत्र में पैम्फलेट बांटे। महागठबंधन ने 243 में से 178 सीटें जीतीं और बीजेपी की सीटें 91 से घटकर 53 रह गईं। आरजेडी अकेले 80 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी। संजय की भूमिका को सराहा गया।​

पार्टी में व्यापक बदलाव


संजय यादव ने आरजेडी की छवि को बदलने में बड़ी भूमिका निभाई। उन्होंने पार्टी की वेबसाइट पर काम शुरू किया और आईटी सेल की स्थापना की जिसने पार्टी और शीर्ष नेताओं के सोशल मीडिया अकाउंट्स को संभालना शुरू किया। वे टोन और टेनर को बदलने पर फोकस करते रहे।​

संजय ने आरजेडी की “मुस्लिम-यादव” पार्टी वाली छवि को बदलने की रणनीति बनाई और इसे “ए टू जेड” पार्टी बनाने का काम किया, जिसमें उच्च जाति और अत्यंत पिछड़ी जातियों के उम्मीदवारों को भी प्रतिनिधित्व मिले। राज्यसभा सांसद मनोज कुमार झा के साथ मिलकर संजय ने 2015 से 2022 तक तेजस्वी के लिए एक परफेक्ट टीम बनाई – जहां झा ज्यादा आइडियोलॉग की भूमिका में थे, वहीं संजय पटना के मामलों को देखते थे।​

2020 का चुनाव: 10 लाख नौकरी का वादा


2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में संजय यादव की सबसे बड़ी रणनीति थी तेजस्वी यादव को 10 लाख सरकारी नौकरियों का वादा करवाना। एनडीए के “जंगलराज” के नारे के विरोध में यह एक काउंटर रणनीति थी।​

संजय की सलाह पर तेजस्वी ने यह भी सुनिश्चित किया कि आरजेडी के पोस्टर और बैनर पर केवल तेजस्वी की तस्वीर हो, न कि लालू और राबड़ी देवी की। यह तेजस्वी को पार्टी के भविष्य के रूप में स्थापित करने और “जंगलराज” के आरोपों को कमजोर करने की रणनीति थी। महागठबंधन 110 सीटें जीता और अगर कांग्रेस 70 में से 19 से ज्यादा जीत पाती तो सरकार बन सकती थी।​

नीतीश कुमार के साथ रणनीति


संजय ने तेजस्वी को सुझाव दिया कि उन्हें नीतीश कुमार के साथ जाना चाहिए और उनके प्रति सॉफ्ट कॉर्नर रखना चाहिए। 2022 में जब नीतीश फिर से एनडीए छोड़कर महागठबंधन में शामिल हुए तो संजय यादव की सलाह पर तेजस्वी ने उनके खिलाफ कड़ी भाषा का इस्तेमाल नहीं किया। 2017 में तेजस्वी ने नीतीश को “पलटू चाचा” और “धोखेबाज” कहा था, लेकिन 2022 में उन्होंने विधानसभा में कहा कि नीतीश के लिए उनके मन में हमेशा सम्मान रहेगा।​

झा और संजय दोनों ने ही अगस्त 2022 में नीतीश कुमार के साथ सरकार बनाने की बातचीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।​

2024: राज्यसभा सांसद बने


फरवरी 2024 में संजय यादव को राज्यसभा का टिकट दिया गया। जब उन्हें सीट का ऑफर किया गया तो शुरुआत में उन्होंने इनकार कर दिया, लेकिन शाम तक लालू जी और अन्य लोगों के दबाव में उन्होंने मान लिया। कई वरिष्ठ नेताओं की दावेदारी को दरकिनार कर संजय को राज्यसभा भेजा गया। मीसा भारती, तेज प्रताप और रोहिणी आचार्य ने इस फैसले का विरोध किया था, लेकिन तेजस्वी का निर्णय मान लिया गया।​

संजय ने कहा कि राज्यसभा सदस्य बनने के बाद भी उनकी भूमिका बिहार की राजनीति में नहीं बदलेगी – “मैं वही काम करता रहूंगा”। संसद में उन्होंने लालू प्रसाद के सामाजिक न्याय के योगदान पर बोला है और दिल्ली में उनका ऑफिस तेजस्वी के कार्यस्थल के रूप में भी काम करता है।​

2025 का बिहार चुनाव और भारी हार


2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में संजय यादव की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही। चुनाव प्रचार से लेकर टिकट बंटवारे और रणनीति तक सब कुछ में उनकी गहरी भागीदारी थी। तेजस्वी ने चुनाव रैलियों, यात्राओं और कॉन्क्लेव में हर जगह संजय को साथ रखा।​​

तेजस्वी ने चुनाव में वादा किया कि सरकार बनने के 20 दिन के अंदर एक नया कानून बनाया जाएगा और 20 महीने में बिहार के हर परिवार को जिसमें सरकारी नौकरी नहीं है, उसे नौकरी दी जाएगी। यह 10 लाख नौकरी के वादे का नया रूप था।​​

लेकिन नतीजे आए तो महागठबंधन की करारी हार हुई। आरजेडी केवल 24 सीटों पर सिमट गई। इस हार के बाद पार्टी के कई सीनियर नेताओं ने संजय यादव की रणनीति पर सवाल उठाए। कार्यकर्ताओं ने भी नाराजगी जताई थी।​​

विवाद और परिवार में कलह


संजय यादव को लेकर आरजेडी में और लालू परिवार में लंबे समय से विवाद रहा है।

तेज प्रताप का विरोध: लालू के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव ने कई बार संजय पर निशाना साधा है। मई 2025 में पार्टी से निष्कासन के बाद तेज प्रताप ने संजय को “जयचंद” (गद्दार का पर्यायवाची) कहा। 2021 में तारापुर उपचुनाव के दौरान जब तेज प्रताप के छात्र विंग के एक नेता ने नामांकन दाखिल किया लेकिन बाद में वापस ले लिया तो तेज प्रताप ने संजय पर साजिश का आरोप लगाया। तेज प्रताप ने संजय को “महाभारत के दुर्योधन” भी कहा।​

सीबीआई की पूछताछ: 2022 में सीबीआई ने संजय यादव को रेलवे में जमीन-के-बदले-नौकरी घोटाले में पूछताछ के लिए बुलाया था। तेजस्वी के निजी सचिव के रूप में संजय को कई बार समन भेजा गया था, हालांकि उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट में नोटिस को चुनौती दी थी। सीबीआई का मानना था कि संजय यादव परिवार और गुड़गांव में मॉल बनाने वालों के बीच कड़ी हो सकते हैं।​​

रोहिणी आचार्य का आरोप: बिहार चुनाव में हार के एक दिन बाद लालू को किडनी देने वाली बेटी रोहिणी आचार्य ने राजनीति और परिवार दोनों से किनारा करने का ऐलान कर दिया। उन्होंने सीधे संजय यादव और उनके सहयोगी रमीज नेमत को जिम्मेदार ठहराया कि इन्हीं दोनों ने उन्हें ऐसा करने के लिए कहा। रोहिणी ने कहा कि उन्हें परिवार से निकाल दिया गया और अगर वे पटना में होतीं तो उन्हें चप्पल से पीटा जाता।​​

पार्टी में संजय का प्रभाव


आरजेडी में संजय यादव को तेजस्वी के बाद नंबर दो माना जाता है। एक आरजेडी विधायक ने नाम न बताने की शर्त पर कहा – “अगर आपको तेजस्वी से मिलना है तो संजय यादव के जरिए ही मिलना होगा। कई बार संजय मीटिंग को यह कहकर मना कर देते हैं कि इसकी जरूरत नहीं है”।​

पार्टी के अंदर शिकायत है कि संजय ने तेजस्वी को सीनियर नेताओं और समाज के व्यापक वर्गों से अलग-थलग कर दिया है। कई वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी छोड़ी क्योंकि संजय तय करते थे कि तेजस्वी से किसकी मुलाकात होगी। आरोप है कि उन्होंने लोक सभा चुनाव के दौरान पप्पू यादव को पार्टी में लाने के खिलाफ सलाह दी, लेकिन पप्पू यादव संजय की गलत सलाह के बावजूद जीत गए।​

एक आरजेडी नेता ने कहा – “आरजेडी को लालू यादव के कारण वोट मिलते हैं। लालटेन के चिन्ह से यादव और मुस्लिम वोट मिलेंगे। संजय यादव की क्या भूमिका है? कोई उनके नाम पर वोट नहीं देगा”।​

वहीं उनका बचाव करने वाले कहते हैं कि संजय ने हमेशा तेजस्वी के हितों को सर्वोपरि रखते हुए फैसले लिए हैं, भले ही उन फैसलों से पार्टी के शक्तिशाली गुटों को गुस्सा आया हो। उनकी तरफदारी करने वाले मानते हैं कि ज्यादातर प्रतिक्रियाएं गलतियों से नहीं बल्कि ईर्ष्या, असुरक्षा और पुराने गार्ड की इस असहजता से आती हैं कि एक गैर-यादव, गैर-बिहारी विश्वासपात्र के पास इतना प्रभाव है।​

एक वरिष्ठ आरजेडी नेता ने कहा – “संजय के रहते आरजेडी को प्रशांत किशोर जैसे किसी व्यक्ति की सेवाओं की जरूरत नहीं पड़ेगी”। यह भी कहा जाता है कि अगर तेजस्वी कभी मुख्यमंत्री बने तो सरकार में संजय नंबर दो होंगे।​

संजय यादव की विरासत


संजय यादव की कहानी हरियाणा के एक छोटे से गांव से बिहार की राजनीति के केंद्र तक पहुंचने की यात्रा है। उनकी मेहनत, रणनीतिक सोच और तेजस्वी के प्रति वफादारी ने उन्हें बिहार की राजनीति में एक प्रमुख व्यक्तित्व बना दिया है।​

2015 और 2020 के चुनावों में उनकी रणनीति ने आरजेडी को महत्वपूर्ण सफलता दिलाई। उन्होंने पार्टी की छवि को “मुस्लिम-यादव” पार्टी से “ए टू जेड” पार्टी में बदलने का काम किया। लेकिन 2025 के चुनाव में भारी हार और परिवार में बढ़ती कलह ने उनकी भूमिका पर सवाल खड़े कर दिए हैं।​​

बीजेपी ने लालू परिवार में संजय यादव को लेकर लड़ाई का फायदा उठाया है। बीजेपी के बिहार यूनिट ने एक भोजपुरी वीडियो ट्वीट किया जिसमें आरोप लगाया गया कि संजय यादव ने “तेजस्वी की आंखों पर पट्टी बांध दी है” और परिवार में दरार पैदा की है। केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने संजय की कुर्सी पर बैठी तस्वीर पोस्ट करते हुए पूछा कि क्या INDIA ब्लॉक ने अपना मुख्यमंत्री चेहरा बदल लिया है।​

आने वाले समय में यह देखना होगा कि बिहार चुनाव की हार और परिवार में बढ़ती खींचतान के बीच तेजस्वी का संजय यादव के प्रति रुख क्या रहता है। लेकिन फिलहाल संजय यादव की कहानी एक ऐसे युवा की है जिसने बिना किसी राजनीतिक बैकग्राउंड के अपनी प्रतिभा और समर्पण से बिहार की राजनीति में अपनी जगह बनाई।​

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