
सहरसा जिले के बनगांव गाँव में एक बालक था। उसका नाम था दिलखुश कुमार। उसके पिता बस ड्राइवर थे और घर में पैसों की कमी थी। बारहवीं के बाद दिलखुश को पढ़ाई छोड़नी पड़ी। घर चलाने के लिए कमाना जरूरी था।
दिल्ली की सड़कों पर रिक्शा खींचना
दिलखुश दिल्ली चले गए। लाखों लोगों की तरह, शहर में पैसे खोजने के लिए। वहाँ उन्होंने रिक्शा खींचा। सुबह से शाम तक, धूप में, भीड़ में। घर के लिए पैसे भेजते रहे। जब तबीयत खराब हुई तो पटना वापस आ गए।
पटना में दिलखुश ने सड़कों पर सब्जियाँ बेचीं। छोटे ठेले पर काम किया। एक बार चपरासी की नौकरी के लिए इंटरव्यू भी दिया। लेकिन उन्हें कह दिया – “तुम कम पढ़े-लिखे हो, योग्य नहीं हो।” दिलखुश को दर्द हुआ, पर हार नहीं मानी।
समस्या से समाधान तक का रास्ता
जब दिलखुश सड़कों पर काम करते थे, तो उन्होंने एक बड़ी समस्या देखी। बिहार के गाँवों में कोई भी शहर तक आसानी से नहीं जा सकता। दरभंगा से पटना जाना है तो टैक्सी का भाड़ा इतना अधिक कि गरीब आदमी की सालों की बचत उड़ जाए। और जो टैक्सी खाली लौटती है, उसमें तो कोई भी सवारी नहीं होती।
दिलखुश को एक विचार आया – क्यों न ऐसी सेवा बनाई जाए जहाँ लोग सिर्फ एक तरफा किराया दें? जो जा रहा है, वो वापसी का खर्च न करे। खाली जगहें भर जाएँ। सब के लिए सस्ता किराया हो।
आर्या गो से RodBez तक
2016 में दिलखुश ने “आर्या गो” शुरू की। एक पुरानी नैनो कार से शुरुआत। कोई ऑफिस नहीं, कोई बड़े संसाधन नहीं। बस एक आइडिया और अपना अनुभव। आर्या गो सफल हुई। लेकिन दिलखुश में और भी बड़ा सपना था।
2022 में उन्होंने RodBez शुरू किया। नाम में बिहार का स्वाद है – “रोड” और “बेज” को मिलाकर “रोडवेज” का बिहारी अंदाज़। यह सेवा गाँव और शहर को जोड़ने के लिए बनी थी।
RodBez ने बदल दिया खेल
RodBez की खासियत है – वन-वे किराया। दरभंगा से पटना? पहले टैक्सी वाले 9,500 रुपये माँगते थे। RodBez दिलखुश को 5,200 में भेज देता है। कैसे? क्योंकि जो लोग पटना से दरभंगा आ रहे हैं, उन्हें भी सवारी चाहिए। खाली जगह नहीं रहती। सब मिल-बैठकर सफर करते हैं। सब की जेब हल्की रहती है।
एक नैनो से शुरुआत करने वाली कंपनी आज 4,000 गाड़ियों तक पहुँच गई है। 1,00,000 से ज्यादा लोगों ने RodBez का ऐप डाउनलोड किया। कंपनी की वैल्यूएशन करोड़ में है।
गाँव और शहर के बीच पुल
RodBez सिर्फ टैक्सी सर्विस नहीं है। यह गाँव और शहर के बीच एक सेतु है। जब लोग मिलते हैं, तो व्यापार आता है। नौकरी आती है। शिक्षा आती है। पूरा परिवार गाँव मिलने जा सकता है क्योंकि सफर सस्ता हो गया।
सीख जो प्रेरणा बन जाती है
दिलखुश की कहानी बताती है कि बहुत पढ़ा-लिखा होना जरूरी नहीं। जरूरी है समझ। जरूरी है लगन। दिलखुश ने सड़कों पर सीखा जो किताबों में नहीं मिलता। वो समझते हैं कि गरीब आदमी को क्या चाहिए। क्योंकि वो खुद गरीब रहे हैं।
आज जो लोग दिलखुश की कंपनी में काम करते हैं, उनमें IIT और IIM से निकले हैं। पर दिलखुश ने Youtube से ऐप डिजाइन करना सीखा। ये उनकी विनम्रता है, उनकी ताकत है।
रिक्शा खींचने वाला लड़का आज बिहार का सपनों का इंजीनियर बन गया है। और उसका सपना अभी रुका नहीं है। केरल से कश्मीर तक, हर गाँव को शहर से जोड़ने का सपना अभी बाकी है।



















