सलाम, पटना का लड़का जो पुतिन की पार्टी में MLA बन गया
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा के ठीक पहले दिल्ली के सियासी गलियारों में एक बिहारी नाम की चर्चा ज़ोरों पर थी— अभय कुमार सिंह । ये कोई साधारण मुलाकात नहीं थी, बल्कि ये उस बिहारी मेधा (intellect) का जलवा था, जिसने पटना की मिट्टी से निकलकर रूस की राजनीति में अपना सिक्का जमाया है । कुर्स्क (Kursk) क्षेत्र से दो बार विधायक चुने गए अभय सिंह आज पुतिन की ‘यूनाइटेड रशिया’ पार्टी के सदस्य हैं, और ये बात हर बिहारी के सीने को गर्व से चौड़ा करने के लिए काफी है ।
जब अभय सिंह भारतीय मीडिया से बात करते हैं, तो उनकी बातों में भारत और रूस के रिश्तों की गर्माहट साफ झलकती है। उन्होंने साफ़ कहा कि पूरी दुनिया भारत और रूस के राष्ट्राध्यक्षों की दोस्ती पर नज़र बनाए हुए है । उनका कहना है कि पुतिन हर देश की यात्रा नहीं करते, लेकिन भारत के लिए यह रिश्ता असाधारण है । एक क्षेत्रीय विधायक (जिसे रूस में डिप्टेट कहते हैं) होकर भी उनका इतना बड़ा बयान देना बताता है कि बिहारी लोग अब दुनिया की सबसे अहम कूटनीतिक बातों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।

संघर्ष की कहानी: जब कड़कड़ाती ठंड में लौटना चाहा, पर इरादे अड़े रहे
अभय सिंह की ये सफलता रातों-रात नहीं मिली। ये उस बिहारी दृढ़ता (resilience) की कहानी है, जिसके दम पर हम कहीं भी टिक जाते हैं। साल 1991 में वह पटना से तत्कालीन सोवियत संघ (USSR) गए थे, ताकि कुर्स्क स्टेट मेडिकल यूनिवर्सिटी में डॉक्टर की पढ़ाई कर सकें । वहाँ की भयानक ठंड ने उन्हें लगभग तोड़ दिया था। एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि वह वापस लौटना चाहते थे, लेकिन उनकी डीन, एलेना, ने उन्हें रोक लिया । जब उन्होंने रूस में घर जैसा महसूस करना शुरू कर दिया, तो फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा— “ऐसा लगा जैसे मैं घर पर हूँ और मैंने फिर कभी वापस नहीं गया,” ।
सोवियत संघ के टूटने के बाद, उन्होंने पुतिन से प्रेरणा ली और राजनीति में कूद पड़े । लेकिन रूस की राजनीति औपचारिक दूरी की मांग करती है, जबकि बिहार की राजनीति ‘टच-एंड-फील’ यानी लोगों से सीधे जुड़ाव पर चलती है।
अभय सिंह ने इस विरोधाभास को तोड़ा। उन्होंने अपने इलाके में ‘जनता दरबार’ लगाना शुरू किया! सोचिए, रूस में पटना स्टाइल का जनता दरबार! वे खुद बताते हैं कि “टनों लोग” अपनी शिकायतें लेकर आते हैं और वह सबकी मदद करने की कोशिश करते हैं । अपनी जड़ों से इस जुड़ाव के कारण ही वह स्थानीय समुदायों में इतने लोकप्रिय हुए । वे आज भी गर्व से कहते हैं: “मैं बिहार से हूँ; राजनीति हमारे DNA में है,” ।
यही नहीं, वह रूस में भी भारतीय खाना ही खाते हैं और बीफ़ (Beef) से परहेज़ करते हैं। उनका कहना है, “मैं सिर्फ़ इंडियन खाता हूँ… जब बाहर होता हूँ, तो बेशक रूसी खाना खाता हूँ। मैं एक ही चीज़ नहीं खाता और वो है बीफ़” । यह दिखाता है कि बिहारी कहीं भी रहें, अपनी संस्कृति और पहचान नहीं भूलते।
वैश्विक पटल पर बिहारी नेतृत्व
अभय सिंह केवल MLA नहीं, बल्कि भारत और रूस के बीच एक मज़बूत पुल हैं। उन्होंने खुले तौर पर भारत के लिए रूस के सबसे अत्याधुनिक S-500 एयर-डिफेंस सिस्टम और Su-57 जैसे उन्नत फाइटर जेट्स की वकालत की है । उनका मानना है कि अगर भारत को S-500 मिलता है, तो वह चीन से पहले इस तकनीक को पाने वाला दुनिया का पहला देश बन जाएगा— जो भारत के लिए एक बड़ी उपलब्धि होगी ।
वह भारतीयों के कल्याण से जुड़े मुद्दे भी उठा रहे हैं। उन्होंने बताया कि रूसी राष्ट्रपति के साथ स्वास्थ्य मंत्री समेत एक बड़ा दल आया है, और जल्द ही भारतीयों के लिए एक नया श्रम गतिशीलता समझौता (labour mobility pact) और रूस में काम करने के लिए ज़्यादा कोटा सुनिश्चित किया जा सकता है । यह कदम उन हज़ारों भारतीयों को फ़ायदा पहुँचाएगा जो रूस में काम की तलाश में हैं ।
चाणक्य से UPSC तक
अभय सिंह की सफलता कोई इत्तफ़ाक नहीं है, बल्कि ये बिहार के हज़ारों साल पुराने ‘नेतृत्व DNA’ का विस्तार है। ये वही धरती है जिसने दुनिया को चाणक्य (कौटिल्य) जैसा महान रणनीतिकार दिया। आज भी उनके ‘अर्थशास्त्र’ को दुनिया में कूटनीति, युद्ध और शासन पर सबसे यथार्थवादी ग्रंथ माना जाता है ।
ज्ञान और सत्ता के केंद्र की ये परंपरा नालंदा विश्वविद्यालय (5वीं शताब्दी ई.पू.) से चली आ रही है । यह दुनिया का पहला आवासीय विश्वविद्यालय था, जहाँ तर्क, गणित और दर्शनशास्त्र जैसे विषयों में कठोर विद्वता की संस्कृति थी ।
इसी प्राचीन भूख के कारण आज भी बिहारी छात्र देश की सबसे कठिन प्रतियोगी परीक्षाओं में अपना दबदबा बनाए रखते हैं। चाहे वो UPSC सिविल सेवा परीक्षा हो, जहाँ बिहार लगातार शीर्ष योगदानकर्ताओं में से एक है , या कला और सिनेमा जगत हो, जहाँ मनोज बाजपेयी, पंकज त्रिपाठी जैसे बड़े नाम हैं — हर जगह बिहारी अपनी मेहनत और दृढ़ता से नेतृत्व के आसन पर पहुँचते हैं।
अभय कुमार सिंह की कहानी इस बात का सबसे नया और ज़िंदा सबूत है कि बिहारी होने का मतलब केवल एक राज्य का निवासी होना नहीं है, बल्कि ये एक वैश्विक महात्वाकांक्षा का नाम है।


















